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सीता की दुविधा, रामकथा का नया रूप

फिल्म समीक्षा: रावणनिर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल माटी वह एरिया है जहां वीरा की सत्ता है। कुछ के लिए वह रॉबिनहुड और कुछ के लिए रावण है। इलाके में जो
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मौज-दर-मौज

मौज-दर-मौज इस वक्त की तल्खीयों का बोझ सबके शानों पर हैऐसे लम्हात में इम्तहाँ से  रोज रू-ब-रू होना पडता हैदरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगेछोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें बड़े-बड़े दर हैं यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं  इस मंज़र की
 
SURINDER RATTI
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दोस्तों के बारे में

कौन समझ सका हैदोस्तों कोसिवाय दोस्तों केआवारा छोकरों का एक झुण्डजो बेझिझक घुस जाता हैघरों मेंजैसे हवा के साथघर में भरा जाते हैंपीले पत्तेकोई वक्त नहीं हैउनके आने कासुबह, दोपहर, शाम या रातकभी भी धमक जाते हैंबिना दरवाज़ा खटखटायेबहुत जल्दी में हुएतो सड़क पर
 
मणिमोहन
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जय बोलो बाबा केदारनाथ और बद्री विशाल की

वक्त का पता नहीं पर आंखों में अब भी धुंधली तस्वीर बाकी है। अपनेराम दस या बारह साल के रहे होंगे। खबर आई कि गांव के कुछ बड़े-बुजुर्ग चार धाम की यात्रा पर जा रहे हैं, उन्हें विदाई देने आ जाओ। पुण्य मिलेगा। छोटी बुद्धि, ज्यादा कुछ नहीं समझ पाई। बाबा की
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जनगणना में “धर्म” शामिल करने की माँग साम्प्रदायिकता है क्या??…… Religion & Caste in India Census 2011

जब इन्फ़ोसिस के पूर्व सीईओ नन्दन नीलकेणि ने बहुप्रचारित और अनमोल टाइप की “यूनिक आईडेंटिफ़िकेशन नम्बर” योजना के प्रमुख के रूप में कार्यभार सम्भाला था, उस समय बहुत उम्मीद जागी थी, कि शायद अब कुछ ठोस काम होगा, लेकिन जिस तरह से भारत की सुस्त-मक्कार और भ्रष्ट
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ऐसे नचनियाये, पिल्‍लाये समय में..

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित,
 
Pramod Singh
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आज मेरी शादी की सालगिरह है ...बधाइयां स्वीकार की जायेंगी!

फरजाना और मेरा वैवाहिक साथ आज पन्द्रहवें साल में दाखिल हो रहा है। धूप छाँव के खेल में जितना मैं पिसता हूँ उससे कहीं ज्यादा वो... ये तो आप भी जानते/ती हैं । आप की बधाइयां एक बार फिर हमें इस बुरे दौर में डट कर खड़े रहने की हिम्मत देंगी ...
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मैं अकेला हो गया हूँ

रो रहा क्यों व्यर्थ रे मनकौन अपना है यंहा पर .मिट गयी हस्ती बड़ों की है हमारी क्या यंहा पर . सबको अपनी ही पड़ी हैचल रहे सब भावना मेंस्वप्न सब बिखरे पड़े जबहै कान्हा कुछ कल्पना में . . स्वर्ग-सुख के मोह में आनरक में मैं बस गया हूँ . आज जग के जाल में कुछ
 
JEEVAN SANGEET
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रचना भी एक साधना

रचना चाहे कोई भी हो, आसान नहीं होती। किसी नयी रचना के लिए कुछ पुराना तोड़ना पड़ता है। जब कुछ ध्वस्त होता है तो रचना की जमीन बनती है। इसे दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि जब रचना होती है तो कुछ ध्वस्त होता है। अंकुर बाहर निकले, इसके लिए बीज को नष्ट होना होता
 
डा.सुभाष राय
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अभी और होंगे बहुत से भोपाल

मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन
 
भुवन भास्कर
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शेर

न समझ मुझे महफिल के टूटे हुए पैमानों में है साख बहुत इस दीवाने की, अभी दीवानों में है ख्याल धुआं हवा के साथ रुख बदल देगा अभी वक्त लगेगा तुम्हें, मुझे भूलने भूलाने में
 
मोहिन्दर कुमार
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पुरुषनिर्मित सौन्दर्यकसौटी पर ही खुद को तोलती है औरतें

विचित्र तो यह है कि स्त्री की मुक्ति का अहसास होने के बावजूद आज भी स्त्री पुरुषनिधार्रित सौन्दर्यमानकों के खांचों में खुद को फिट करने की होड. में शामिल है। आज भी उनका सौंदर्यबोध  उनका सपना पुरुष की नज़रों  में सुन्दर लगना ही है। उनकी
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धूप कणी (मुक्तक) - शशि पाधा

जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस अतिरिक्त...
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बूढ़ा जीवन रीता रीता -पर न जाने कब मैं मुक्ति पाऊंगा

अब जब सब की बहुत जरुरत है किसी के पास भी समय नहीं है हर समय आकाश को तकताबूढी माँ को देखा करता आँखों में वो अकेलापन कोई नहीं शायद देख पाया पर चूकिंमैं उसके कोख से जन्मा था उसका दर्द मेरे दर्द से अलग ना हो पाया अब जब मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ घुटने बोल चुके
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महारानी के महा बलिदान दिवस पर विशेष

झाँसी की रानीसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने
 
शिवम् मिश्रा
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नमन एक वीरांगना को

गंगा धर राव की पत्नी होना मनु का धर्म था और क्रांति गुरु होना मनु का कर्म था । आज मनु , मणिकणिका , रानी लक्ष्मी बाई की पुण्य तिथि १८ जून हैं ।हिंदी ब्लॉग जगत मे कुछ प्रविष्टियाँ आयी हैं जिनको संगृहीत कर दिया हैंहर प्रविष्टि को पढे और नमन का कमेन्ट दे कर
 
रचना
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ------ सुभद्राकुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थीबूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थीगुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थीदूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थीचमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थीबुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थीखूब लड़ी
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मेरी नालायक सी दोस्त रिया :)

वो मेरी सबसे नालायक दोस्त है, और मैं उसका सबसे नालायक दोस्त :) ऐसा ही वो कहती है..हमारे बीच अगर लड़ाई न हो कभी फोन पे तो दोनों को अजीब सा लगता है, रात को नींद नहीं आती..बेचैनी सी रहती है, इसलिए हमने तय कर रखा है की जब भी फोन मैं उसे करूँ या वो मुझे करे तो
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क्यों न निजी कंपनियों को सौंपी जाए जंगल की सुरक्षा

नीरज नैयरएक लंबी खामोशी के बाद आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व को अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे बाघो के बारे में सोचने का वक्त मिल ही गया। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में प्रधानमंत्री ने बाघ बचाओ मुहिम में रायों की कमजोर भागीदारी पर चिंता जाहिर की, उन्होंने इस
 
Neeraj Nayyar
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हर घर में है एक खाप पंचायत

हर घर में एक खाप पंचायत हैखाप पंचायतें इन दिनों हर जगह चर्चा का विषय हैं। इनके द्वारा निर्णय और उन निर्णयों पर क्रूरतापूर्ण अमल न्यायपालिका से कहीं अधिक तेज़ गति से होता है। वैसे तो ये पंचायतें वर्षों पुरानी है और इस तरह के दिल दहलाने वाले निर्णय पहले भी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हकार.... बाबा नागार्जुन के गांव से -

साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रतीक पुरुष बाबा नागार्जुन आज नहीं हैं लेकिन उनकी महान विरासत हमारे साथ है। बिहार के मिथिलांचल का एक गांव तरौनी इसलिए धन्य है कि वहीं नागार्जुन जैसे दुर्धर्ष कवि का जन्म हुआ था। उसकी रचनाओं में वहाँ की मिट्टी, पानी और हवा के
 
अरविन्द श्रीवास्तव
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मुसलसल ग़ज़ल

वह कहते हैं हुकूमत चल रही हैमैं कहता हूँ हिमाक़त चल रही है उजाले जी हुज़ूरी कर रहे हैंअंधेरों की सियासत चल रही है सब अपने आप चलता जा रहा हैकहाँ कोई क़यादत चल रही है अगर इन्साफ है तो किसकी ख़ातिरअदालत पर अदालत चल रही है वह कल दुश्मन के होंगे साथ लेकिनअभी
 
ravish kumar
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मैंने घर को जंगल बना रखा है !

इधर या उधर आगे या पीछेनीचे और उपर(!) जिधर से शुरू करूँपेड़ ही पेड़ हैं(झाड़ियों को भी यही समझता हूँ मैंजैसे ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग एक ही समझे जाते हैं)बाँस, पीले फूलों वाला केलकटहल, गूलर, गुच्छों और विरल फूलों वाला लाल कनेरअशोक, बोगनबेलिया लाल, गुलाबी,
 
डॉ. राजेश नीरव
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वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल, साहित्य, दर्शनशास्त्र और कामू के फटे जूते

फ़ुटबॉल का विश्व कप धीरे धीरे रंग पकड़ रहा है. इस बार ग्रुप सी का हिस्सा है अल्जीरिया की टीम. पहला मैच स्लोवेनिया से ०-१ से हार चुकी है. अभी उसने इंग्लैण्ड और अमेरिका से मैच खेलने बाक़ी हैं. अल्जीरिया मेरी फ़ेवरेट टीम तो नहीं रही है पर हर बार उसके
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ओ मेरे मनमीत!

'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता रावेन्द्र कुमार रवि जी का एक प्रेम-गीत 'ओ मेरे मनमीत'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... सोच रहा-तुम पर ही रच दूँ मैं कोई नवगीत! शब्द-शब्द में यौवन भर दूँ, पंक्ति-पंक्ति में प्रीत! हर पद
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कर्ज़दार---2

कर्ज़दारपिछली कडी मे आपने पढा कि प्रभात की माँ ने अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के
 
निर्मला कपिला
टैग: कहानी
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जिन्होंने देश वा धर्म क़े लिए पिता, पुत्र को भी बलिदान किया

       भारत वर्ष में संघर्ष क़ा काल चल रहा था मुगलों क़ा अधिपत्य था भारत माता ,गौ माता त्राहि-त्राहि कर रही थी बलात मुस्लमान बनाया जा रहा था कश्मीर व अन्य स्थानों से तमाम साधू,संत व ब्राहमण आये थे धर्म सभा लगी थी ,गुरु तेगबहादुर ने
 
दीर्घतमा
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काले मेघा आओ ना

काले मेघा आओ नागर्मी दूर भगाओ ना।गगरी खाली गांव पियासानदिया से ना कोई आशा।सूख गये सब ताल तलैयाकैसे गायें छम्मक छैयां।धरती को सरसाओ नाकाले मेघा आओ ना॥सुबह सुबह ही सूरज दादागुस्सा जाते इतना ज्यादा।कष्टों की ना कोई गिनतीसुनते नहीं हमारी विनती।कुछ उनको समझाओ
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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अच्छे विचार : बुरे विचार

“मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है. मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं. मैं उन कार्यों को करने की योजनायें बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे
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रांझा रांझा : बुल्ले शाह के अद्वैत से गुलजार के द्वैत तक

पहुँचे हुये संतो, सिद्धों और सूफियों ने हमेशा अपने और प्रभु के बीच अद्वैत की कल्पना की है या बात की है या दुनिया को बताया है कि आत्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो गयी है। वे लगातार स्तुति से, लगातार ध्यान से एक दशा ऐसी आ जाने का बखान करते रहे हैं जब दूसरा
 
cinemanthan
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ग़म बढ़ा, बढ़ता गया, बेइन्तिहां होता गया

ग़म बढ़ा, बढ़ता गया, बेइन्तिहां होता गया फ़ासिला सा जब हमारे दर्मियां होता गया क्या करें इस हिज्र के आलम में हम जाएं कहां साँस लेना भी अगर्चे इम्तिहां होता गया क्यों ना टपके खून आँखों से, ज़हन से, जिस्म से जज़्बा-ए-दिल प्यार में जब खूंचकां होता गया हमने मांगा
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बौली या पौली?

बम्बई के फ़िल्म जगत को बौलीवुड का नाम कब मिला यह तो कोई ठीक से नहीं कह सकता, विकीपीडिया भी नहीं. मुझे लगता है कि 1970 के दशक में बम्बई से निकलने वाली स्टारडस्ट, सिने ब्लिट्ज़ जैसी फ़िल्मी पत्रिकाओं में तब भी बौलीवुड शब्द का प्रयोग होता था. इधर पिछले कुछ
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राँझा राँझा

प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए… बड़ा मज़ेदार किस्सा है… शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट
 
मिहिर
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दिव्‍य रौशनी के सौदागरो - विनय कुमार

प्रिज्ममेरे भीतर एक प्रिज्म है जब भी कोई रोशनी मुझसे होकर गुज़रती है फट जाती है और सात रंग की चिंदियाँ झिलमिला उठती हैं यह प्रिज्म मेरी जान है मेरे होने की पहली शर्त मेरे बचपन का पहला खिलौना पहली किताब इसकी ढलान पर चढ़ने की कोशिश में जवान हुआ गिरा-पड़ा घायल
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सामाजिक न्याय के शेष प्रश्न

सत्येंद्र रंजन क्या जन-गणना में जाति भी पूछी जाए? यह सवाल फिलहाल केंद्र सरकार के एक मंत्रि-समूह के पास है, और उसके फैसले का सबको इंतजार है। सरकार का फैसला राजनीतिक होगा, इस बात का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। ना सिर्फ व्यापक राजनीतिक फलक पर, बल्कि
 
सत्‍येंद्र रंजन
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यार, यहां पर बड़ी Politics हो रही है।

मुझे नफ़रत हैं ऐसे लोगों से। लेकिन क्या करें, कुछ लोगों की दुकानदारी ही ऐसे चलती है। वो उस मछली के किरदार में होते हैं जो पूरे तालाब को सड़ा देती है। जिनका स्वार्थ ही दूसरों को छोटा साबित करके ख़ुद को बड़ा बनाना है। और आख़िर में अपनी आदत से मजबूर होकर वो
 
अनुराग मुस्कान
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कोशिकाएं मरती रहती हैं तो इंसान जीता है

एपॉप्टोसिस शरीर की कोशिकाओं के मरते जाने की पूर्व नियोजित व्यवस्था है जो किसी अंग के पूरी तरह विकसित होने तक सहयोग करती है, लेकिन उसके बाद कोशिकाओं को बढ़ने से रोक देती है। जैसे, मानव भ्रूण में जब तक अंगूठे और उगलियां विकसित नहीं हो जातीं, तब तक यह
 
अनिल रघुराज