सीता की दुविधा, रामकथा का नया रूप
फिल्म समीक्षा: रावणनिर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल माटी वह एरिया है जहां वीरा की सत्ता है। कुछ के लिए वह रॉबिनहुड और कुछ के लिए रावण है। इलाके में जो
Jun 18 2010 03:19 PM



मौज-दर-मौज इस वक्त की तल्खीयों का बोझ सबके शानों पर हैऐसे लम्हात में इम्तहाँ से रोज रू-ब-रू होना पडता हैदरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगेछोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें बड़े-बड़े दर हैं यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं इस मंज़र की
जूनियर ब्लॉगर एसोशिएशन की 'ब्लॉग निगरानी समिति' का गठन हुआ; सम्बंधित पदाधिकारी चुने गए. दिनांक 17.06.2010 को सर्वसम्मति से यह पारित हुआ कि अब 'जेबीए' की 'ब्लॉग निगरानी समिति' का गठन किया जाएगा. और इस हेतु तीन सदस्य को इस
कौन समझ सका हैदोस्तों कोसिवाय दोस्तों केआवारा छोकरों का एक झुण्डजो बेझिझक घुस जाता हैघरों मेंजैसे हवा के साथघर में भरा जाते हैंपीले पत्तेकोई वक्त नहीं हैउनके आने कासुबह, दोपहर, शाम या रातकभी भी धमक जाते हैंबिना दरवाज़ा खटखटायेबहुत जल्दी में हुएतो सड़क पर
वक्त का पता नहीं पर आंखों में अब भी धुंधली तस्वीर बाकी है। अपनेराम दस या बारह साल के रहे होंगे। खबर आई कि गांव के कुछ बड़े-बुजुर्ग चार धाम की यात्रा पर जा रहे हैं, उन्हें विदाई देने आ जाओ। पुण्य मिलेगा। छोटी बुद्धि, ज्यादा कुछ नहीं समझ पाई। बाबा की
कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित,
फरजाना और मेरा वैवाहिक साथ आज पन्द्रहवें साल में दाखिल हो रहा है। धूप छाँव के खेल में जितना मैं पिसता हूँ उससे कहीं ज्यादा वो... ये तो आप भी जानते/ती हैं । आप की बधाइयां एक बार फिर हमें इस बुरे दौर में डट कर खड़े रहने की हिम्मत देंगी ...
रो रहा क्यों व्यर्थ रे मनकौन अपना है यंहा पर .मिट गयी हस्ती बड़ों की है हमारी क्या यंहा पर . सबको अपनी ही पड़ी हैचल रहे सब भावना मेंस्वप्न सब बिखरे पड़े जबहै कान्हा कुछ कल्पना में . . स्वर्ग-सुख के मोह में आनरक में मैं बस गया हूँ . आज जग के जाल में कुछ
बामुलाहिजा >> Cartoon by Kirtish Bhatt
मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन
विचित्र तो यह है कि स्त्री की मुक्ति का अहसास होने के बावजूद आज भी स्त्री पुरुषनिधार्रित सौन्दर्यमानकों के खांचों में खुद को फिट करने की होड. में शामिल है। आज भी उनका सौंदर्यबोध उनका सपना पुरुष की नज़रों में सुन्दर लगना ही है। उनकी
जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस अतिरिक्त...
अब जब सब की बहुत जरुरत है किसी के पास भी समय नहीं है हर समय आकाश को तकताबूढी माँ को देखा करता आँखों में वो अकेलापन कोई नहीं शायद देख पाया पर चूकिंमैं उसके कोख से जन्मा था उसका दर्द मेरे दर्द से अलग ना हो पाया अब जब मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ घुटने बोल चुके
झाँसी की रानीसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने
क्या चीज है यह जबान भी? कभी बड़े भाई जैसे अपनत्व भरे शब्द को वैमनस्य भरा शब्द बना देती है "जबान संभाल के बड़े भाय ... बहुत मंहगा पड़ेगा हमसे उलझना" के रूप में। तो कभी लल्लू जैसे मखौल उड़ाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले शब्द को अत्यन्त प्यारा शब्द बना देती
प्रसिद्ध चिट्ठाकार और हिंदी सेवी कविता वाचकनवी को एक दुर्घटना में गहरी चोट आई है, जिससे उनके दाहिने पैर की टखने की हड्डी टूट गई है. इस समय वह लन्दन में बेड रेस्ट पर हैं. उन्हें चलने के लिए बैसाखी का सहारा लेना पड़ रहा है. घटना १६ तारीख की है, जब वे एक झील
बिलासपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता एवं जस्टिस सुनील सिन्हा की युगलपीठ ने एसईसीएल के खिलाफ कोयला उत्खनन के लिए ग्राम लाट में भूमि अधिग्रहण कर मुआवजा नहीं देने संबंधी दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। शासन ने अपने जवाब में याचिका को जनहित के
वो मेरी सबसे नालायक दोस्त है, और मैं उसका सबसे नालायक दोस्त :) ऐसा ही वो कहती है..हमारे बीच अगर लड़ाई न हो कभी फोन पे तो दोनों को अजीब सा लगता है, रात को नींद नहीं आती..बेचैनी सी रहती है, इसलिए हमने तय कर रखा है की जब भी फोन मैं उसे करूँ या वो मुझे करे तो
नीरज नैयरएक लंबी खामोशी के बाद आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व को अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे बाघो के बारे में सोचने का वक्त मिल ही गया। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में प्रधानमंत्री ने बाघ बचाओ मुहिम में रायों की कमजोर भागीदारी पर चिंता जाहिर की, उन्होंने इस
साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रतीक पुरुष बाबा नागार्जुन आज नहीं हैं लेकिन उनकी महान विरासत हमारे साथ है। बिहार के मिथिलांचल का एक गांव तरौनी इसलिए धन्य है कि वहीं नागार्जुन जैसे दुर्धर्ष कवि का जन्म हुआ था। उसकी रचनाओं में वहाँ की मिट्टी, पानी और हवा के
वह कहते हैं हुकूमत चल रही हैमैं कहता हूँ हिमाक़त चल रही है उजाले जी हुज़ूरी कर रहे हैंअंधेरों की सियासत चल रही है सब अपने आप चलता जा रहा हैकहाँ कोई क़यादत चल रही है अगर इन्साफ है तो किसकी ख़ातिरअदालत पर अदालत चल रही है वह कल दुश्मन के होंगे साथ लेकिनअभी
इधर या उधर आगे या पीछेनीचे और उपर(!) जिधर से शुरू करूँपेड़ ही पेड़ हैं(झाड़ियों को भी यही समझता हूँ मैंजैसे ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग एक ही समझे जाते हैं)बाँस, पीले फूलों वाला केलकटहल, गूलर, गुच्छों और विरल फूलों वाला लाल कनेरअशोक, बोगनबेलिया लाल, गुलाबी,
'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर आज प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटता रावेन्द्र कुमार रवि जी का एक प्रेम-गीत 'ओ मेरे मनमीत'. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा... सोच रहा-तुम पर ही रच दूँ मैं कोई नवगीत! शब्द-शब्द में यौवन भर दूँ, पंक्ति-पंक्ति में प्रीत! हर पद
कर्ज़दारपिछली कडी मे आपने पढा कि प्रभात की माँ ने अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के
भारत वर्ष में संघर्ष क़ा काल चल रहा था मुगलों क़ा अधिपत्य था भारत माता ,गौ माता त्राहि-त्राहि कर रही थी बलात मुस्लमान बनाया जा रहा था कश्मीर व अन्य स्थानों से तमाम साधू,संत व ब्राहमण आये थे धर्म सभा लगी थी ,गुरु तेगबहादुर ने
काले मेघा आओ नागर्मी दूर भगाओ ना।गगरी खाली गांव पियासानदिया से ना कोई आशा।सूख गये सब ताल तलैयाकैसे गायें छम्मक छैयां।धरती को सरसाओ नाकाले मेघा आओ ना॥सुबह सुबह ही सूरज दादागुस्सा जाते इतना ज्यादा।कष्टों की ना कोई गिनतीसुनते नहीं हमारी विनती।कुछ उनको समझाओ
“मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है. मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं. मैं उन कार्यों को करने की योजनायें बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे
ग़म बढ़ा, बढ़ता गया, बेइन्तिहां होता गया फ़ासिला सा जब हमारे दर्मियां होता गया क्या करें इस हिज्र के आलम में हम जाएं कहां साँस लेना भी अगर्चे इम्तिहां होता गया क्यों ना टपके खून आँखों से, ज़हन से, जिस्म से जज़्बा-ए-दिल प्यार में जब खूंचकां होता गया हमने मांगा
बम्बई के फ़िल्म जगत को बौलीवुड का नाम कब मिला यह तो कोई ठीक से नहीं कह सकता, विकीपीडिया भी नहीं. मुझे लगता है कि 1970 के दशक में बम्बई से निकलने वाली स्टारडस्ट, सिने ब्लिट्ज़ जैसी फ़िल्मी पत्रिकाओं में तब भी बौलीवुड शब्द का प्रयोग होता था. इधर पिछले कुछ
प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए…
बड़ा मज़ेदार किस्सा है…
शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट
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