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संवेदना संसार

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09 Jun 2010
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शिक्षा और आत्मविकास

कथा कहानियों से मेरा लगाव संभवतः जन्मगत ही था ,जो स्वतः ही मुझे इसके विभिन्न श्रोतों से सदैव ही जोड़ता रहा..कथा संसार में तन्मयता से विचरण कर नित नवीन अनुभव प्राप्त करना और उसे जीवन सन्दर्भ में देखना गुनना मुझे अतिशय प्रिय था. बचपन में नयी कक्षा में जाने
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उन्माद सुख ....

अपने जन्मजात संस्कार और अभिरुचियों के अतिरिक्त अपने परिवेश में जीवन भर व्यक्ति जो देखता सुनता और समझता है उसीके अनुरूप किसी भी चीज के प्रति उसकी रूचि- अरुचि विकसित होती है..बचपन से ही नशेड़ियों को जिन अवस्थाओं में और व्यवहार के साथ मैंने देखा , इसके
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खुजली का सुख

मानव शरीर में होने वाले व्याधियों में ऐसी कोई व्याधि नहीं जो कष्टकर न हो...परन्तु " खुजली " एक ऐसी व्याधि है जो त्वचा को भले लाख घात पहुंचाए पर खुजाने का स्वर्गिक सुख आनंद और तृप्ति का वह भली प्रकार कह सकता है जो कभी भी इस व्याधि के चपेट में आ चुका हो और
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आ'रक्षण - रक्षण किसका ??

नेताजी बहुतै खिसियाये हुए हैं.आजकल जहाँ देखिये वहां चैनल सब पर चमक रहे हैं और सबको चमका रहे हैं...एलान किये हैं कि उनका लाश पर महिला आरक्षण बिल पास होगा.....नेताजी फरमाते हैं .....वे महिलाओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वो तो इतना चाहते हैं कि महिला आरक्षण
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बहुत याद आये !!!

मादक मंद समीर बसंती,छूकर तन, मन को सिहराए,इस मोहक बेला में साथी, आये, बहुत याद तुम आये !!!नींद पखेरू,पलकों को तज,स्मृति गगन में चित भटकाए,इस नीरव बेला में साथी,आये, बहुत याद तुम आये !!!पूनम का चंदा ये चकमक,छवि बन तेरा, नेह लुटाये, इस मादक बेला में साथी,
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भक्ति शक्ति युक्ति आगार...

कौनो घनघोर मजबूरी में घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में सुनसान सड़क पर एकदम अकेले कहीं चलल जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर और टिटही अपना तान राग छेडले स्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न
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भक्ति शक्ति युक्ति आगार...

कौनो घनघोर मजबूरी में घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में सुनसान सड़क पर एकदम अकेले कहीं चलल जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर और टिटही अपना तान राग छेडले स्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न
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लोकधर्म (अंतिम भाग )

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की अनुपम कृति "गोस्वामी तुलसीदास" से साभार :- भक्त कहलानेवाले एक विशेष समुदाय के भीतर जिस समय यह उन्माद कुछ बढ़ रहा था , उस समय भक्तिमार्ग के भीतर ही एक ऐसी सात्त्विक ज्योति का उदय हुआ जिसके प्रकाश में लोकधर्म के छिन्नभिन्न होते
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लोकधर्म (भाग - ३)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की कृति "गोस्वामी तुलसीदास" से साभार)----------------------------------------------- भक्ति के तत्व को हृदयंगम करने के लिए उसके विकास पर ध्यान देना आवश्यक है | अपने ज्ञान की परमिति के अनुभव के साथ साथ मनुष्य जाति आदिम काल से ही
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लोकधर्म (भाग -२)

लोकधर्म - (ले . श्री आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक " गोस्वामी तुलसीदास " से- ) **************************इसाई ,बौद्ध ,जैन इत्यादि वैराग्यप्रधान मतों में साधना के जो धर्मोपदेश दिए गये , उनका पालन अलग अलग कुछ व्यक्तियों ने चाहे किया हो, पर सारे समाज ने
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लोकधर्म (भाग -१)

ईश्वर की अपार अनुकम्पा से कुछ दिनों पूर्व आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखित अप्रतिम कृति " गोस्वामी तुलसीदास " पढने का सौभाग्य मिला.पुस्तक की प्रस्तावना में डाक्टर हरिवंश तरुण ने लिखा है -"आचार्य शुक्ल ने इस शिखर कृति में तुलसी की भक्ति-पद्धति,प्रकृति और
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स्मृति कोष से...

विशेषकर उस वय तक जबतक कि संतान पलटकर अपने अभभावक को जवाब न देने लगे,उनकी अवहेलना न करने लगे,विरले ही कोई माता पिता अपने संतान के विलक्षणता के प्रति अनाश्वस्त होते हैं ..संसार के प्रत्येक अभिभावक जितना ही अपनी संतान में विलक्षणता के लिए लालायित रहते ह
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बुरा जो देखन मैं चला......

एक स्त्री होते हुए स्वयं भी उन समस्त विषम परिस्थितियों से गुजरी हूँ जिससे एक आम भारतीय स्त्री को गुजरना पड़ता है और आस पास असंख्य स्त्रियों को भी उन त्रासदियों से गुजरते उनसे जूझते देखा सुना है... परन्तु फिर भी बात जब समग्र रूप में स्त्री पुरुष की हो
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महत्तम - विवेक !!!

इस संसार में कोई भी शब्द अपने आप में पूर्ण नहीं होता..शब्द को पूर्णता या अर्थ तो उसमे निहित उद्देश्य देते हैं, चाहे सत्य, अहिंसा, स्नेह ,शांति, करुणा, क्षमा आदि जैसे असंख्य सकारात्मक शब्द हों या क्रोध, हिंसा, दंड, घृणा, असत्य आदि आदि असंख्य नकारात्मक
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क्षमादान !!!

जन्मगत हों या स्वनिर्मित, ह्रदय से गहरे जुड़े सम्बन्ध, हमें जितना मानसिक संबल और स्नेह देने में समर्थ होते हैं,जितना हममे जोड़ते हैं,कभी कभार जाने अनजाने ह्रदय को तीव्रतम आघात पहुंचा हमें तोड़ने में भी उतने ही प्रभावी तथा सक्षम हुआ करते हैं...स्वाभावि
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नक्सलवाद का वाद (???)

स्वयं को बहुत पहले से ही मैंने चेता रखा था कि, अपनी तथा अपने संवेदनशीलता की रक्षा के लिए कभी भी कुछ खाते पीते समय समाचार पठन या दर्शन न किया करूँ...परन्तु दुर्भाग्यवश आज उसे विस्मृत कर दोपहर के भोजन काल में टी वी पर समाचार देखने बैठ गयी ..सामने कल तक
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सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग - 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.गतांक से आगे...परन्तु क्या यह सब इतना ही सहज था..एक ओर तो क्षोभग्रस्त महारानी लज्जा शोक और पापबोध से घुली जा रही थीं, तो दूसरी ओर कणाद भी मोह और विवेक के मध्य छिड़े गहन द्वंद में घिरा अपना मत और करनीय स्थिर करने में
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Sep 25 2009 09:14 AM
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सिंदूरदान (एक पौराणिक आख्यान) भाग-1

वैदिक युग के भी पूर्व सतयुग के आरंभिक काल की कथा है.उन दिनों माता जान्हवी धरा पर अवतरित न हुई थीं..सिन्धु तथा सरस्वती नदी के संगमस्थल पर दैवज्ञ आचार्य महर्षि खालित का गुरुकुल अवस्थित था. महर्षि की बाल विधवा भगिनी गांधारी आश्रम की संचालिका थी.महर्षि के
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Sep 23 2009 12:25 AM
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समालोचना !!!

सम्पूर्ण श्रृष्टि में चर चराचर, प्रत्येक उद्यम सुख और आनंद प्राप्ति के निमित्त ही तो करते हैं. परन्तु समस्या यह है कि सुख आनंद विभिन्न श्रोतों द्वारा जितना अधिक हम लेने / जोड़ने में तत्पर रहा करते हैं, उतना किसी को देने में नहीं. जबकि यदि हम सचमुच ही
Sep 09 2009 12:58 PM
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मुद्रा चिकित्सा (भाग -२)

भाग - १ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.अतिविनाम्रतापूर्वक मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं कोई योग विशेषज्ञ नहीं और न ही मुद्रा चिकित्सा में मैंने कोई विशेषज्ञता प्राप्त की है..ईश्वर की असीम अनुकम्पा से बाल्यावस्था से ही अपने परिवेश तथा अन्यान्य
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मुद्रा चिकित्सा (भाग -१)

प्राणी जगत में समस्त प्राणियों में सर्वाधिक सामर्थ्यवान प्राणी मनुष्य ही है,यह सर्वविदित है..परन्तु अपने सम्पूर्ण जीवन काल में अपने सामर्थ्य के दशांश का भी सदुपयोग विरले ही कोई मनुष्य कर पाता है,यह दुर्भाग्यपूर्ण है....एक शरीर के साथ ही अपार सामर्थ्य का
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क्षय हो .....

भारतीय संस्कृति की महान संरक्षिका एवं संवाहिका, प्रातः स्मरणीया परम आदरणीया सुश्री राखी सावंत जी का अति रोमांचक प्रेरणादायी औत्सुक्यप्रद स्वयंवर, जनक नंदिनी मैया सीता, द्रुपद दुहिता द्रौपदी तथा ऐसे ही अन्यान्य असंख्य स्वयंवरों को लघुता देता, नवीन मानदंड
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बेटी - लक्ष्मीस्वरूपा....

पिताजी की चिट्ठी आई थी,माँ की तबियत कुछ खराब है,तुमसे मिलने की जिद ठाने हुए है,हो सके तो दो दिन के लिए आकर मिल जाओ...चार दिन बाद से थर्ड ईयर के पेपर शुरू होने वाले थे...मैं ऊहापोह में था कि क्या करूँ...लेकिन माँ का मोह सब पर भारी पड़ा और मैं स्टेशन क
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अमरत्व की लालसा ------>>>>

जीवन में सबकुछ सामान्य हो, फिर भी संक्षिप्त जीवन की अभिलाषा रखने वाले मनुष्य संसार में दुर्लभ ही रहे हैं. इतिहास साक्षी है ,अमरत्व पाने के लिए व्यक्ति ने न जाने कितने संधान किये ,इस हेतु क्या क्या न किया....... मृत्यु भयप्रद तथा अमरत्व की अभिलाषा चिर
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यादों की खूंटी पर टंगा पजामा !!!

सहज स्वाभाविक रूप से दुनिया के प्रत्येक अभिभावक के तरह मेरे माता पिता की भी मुझसे बहुत सी अपेक्षाएं थीं, बहुत से सपने उन्होंने देख रखे थे मेरे लिए... पर समस्या यह थी कि माताजी और पिताजी दोनों के सपने विपरीत दिशाओं में फ़ैली दो ऐसी टहनियों सी थी जिनका
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गुनाहगार

भगवान् ने अपनी पसंद से माँ बाप संतान या रिश्तेदार चुनने का हक किसी को नहीं दिया है,यदि दिया होता तो ऐसे असंख्य लोग होते जिन्होंने अपने से जुड़े लोग बदल लिए होते.... अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर गुरबत में भी इंजीनियरिंग और एम् बी ए की डिग्रियां हासि
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भोज !!!!

कहाँ नहीं मनौती मानी गयी।अंगरेजी डाक्टर, बैद हकीम, गंडा ताबीज क्या क्या न किया गया॥आखिर शादी के बारहवें बरस में भाग बना और देवकी बाबू के घर चिराग जला था...सरोज के विकल ममत्व को स्नेह अवलंबन मिला....नन्हा सोनू दोनों के जीवन का सार था.दोनों पति पत्नी क
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दृष्टिकोण ...........

कभी कहीं पढ़ी हुई ,सुनी हुई एक सामान्य प्रसंग ,एक साधारण वाक्य या घटना भी कभी कभी मर्म को स्पर्श कर मन एवं चिंतन को ऐसे उद्वेलित कर दिया करती है कि सोच की दिशा बदल जीवन धारा ही बदल जाया करती है.... आज अपनी एक नितांत ही व्यक्तिगत और गोपनीय अनुभूति यह स
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सुख का मार्ग !!!

समाचार पत्र के साथ भी बड़ी विचित्र विडंबना है...सुबह के पहली किरण के साथ जितनी उत्सुकता और स्नेह से इसका स्वागत होता है,पाठोपरांत उतनी ही निर्ममता से इसका तिरस्कार भी होता है..परन्तु इन समाचार पत्रों में बहुत कुछ कभी न पुराने पड़ने तथा सहेजने योग्य सा
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सप्त्शी के तालीबानी....

किसी भी धर्म के पूज्य ग्रंथोँ, जिन्हें कि न जाने कितने महत अन्वेश्नोपरांत लिखा गया है, को केवल ऊपरी सतही तौर पर पढ़कर, यदि हम शब्द आधारित विश्लेषण करेंगे और उसके विषय में अपना अभिमत स्थिर करेंगे तो यह उस ग्रन्थ और उसके रचयिता के श्रम और उद्देश्य की अ
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श्रद्धा पूजा आधार वही !!!

पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे, जिस पल भी व्याकुल करते हैं. सब ताप मेरे संताप मेरे, उन नयनो में घिर झरते हैं. उन अश्रु कणों के सागर में, आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा, जलधि बाहर क्योंकर आऊं, जो जल ही जीवन सार निरा. व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का, वह पूर्ण प्रतिष
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लेडी डॉक्टर (संस्मरण)

यह संभवतः प्रत्येक पीढी के साथ होता है कि ३५ - ४० या ४५ की वय पार कर जाने के बाद, लोग मानसिक रूप से अतीत में जीने में सुखानुभूती करते हैं. ईश्वर ने मानव मस्तिष्क में ऐसी व्यवस्था कर दी है कि समय के साथ स्वतः ही दुखद स्मृतिया धुंधली पड़ क्षीण हो जाती ह
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प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग - 2

रामेश्वर अपनी ही बेटी के खून से अपने हाथ रंग आये थे...तेरह बरस में शादी और गौने से पहले ही साल भर के अन्दर विधवा हुई बेटी का दुःख उनसे देखा नहीं गया और उसके मोह में पड़कर घर परिवार सबकी बात काटते हुए उन्होंने अपनी अपार सहृदयता दिखाते हुए उसे पढाई में
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प्रतिष्ठा !! (कहानी) भाग- 1

गिनती के पच्चीस दिन ही तो बचे थे चुनाव के.दिन भर की दौड़ धूप गोष्ठी और मगजमारी के बाद थक कर चूर हो चुके थे बिन्देश्वर बाबू. हवा का जो रुख अभी दिखाई पड़ रहा था,वह बहुत अधिक उत्साह जनक नहीं था.कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था. अब पहले वाली बात न रही थी.उन
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द्वापर वहीँ ठहरा है........

जीवन में कई बार ऐसा होता है कि कोई स्थिति विशेष, प्रसंग, परिभाषाएं, शब्द, भाव वर्षों तक मन मष्तिष्क के सम्मुख उपस्थित रहते हुए भी अस्पष्ट औचित्यहीन होकर मनोभूमि पर विखण्डित से अवस्थित होते हैं और फिर किसी एक कालखंड में ऐसा कुछ घटित हो जाता है कि वे अ
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अरे, वाह !! हम तो ब्लागर हैं !!!

आज तक ब्लागिंग हमारे लिए पढने और उद्गारों को अभिव्यक्त करने का एक सुगम माध्यम भर था ,पर भाई शैलेश भारतवासी के प्रयास से बाईस फरवरी को रांची में आयोजित अभूतपूर्व इस ऐतिहासिक ब्लागर मीट में क्या सम्मिलित हुए कि जबरदस्त अनुभूति हुई, लगा हम इलेक्ट्रानिक
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!!! झूम बराबर झूम !!!

भक्त प्रहलाद जब प्रभु प्रेम सरिता में आकंठ निमग्न हो तन मन की सुधि बिसरा तन्मय हो प्रभु वंदन में लीन हो जाते और झूमकर गायन और नृत्य में मग्न हो जाते थे तो उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए देवता भी विभोर हो इस विहंगम दृश्य का अवलोकन करने और इस दुर्लभ र
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आमदनी चौअन्नी ,खर्चा अढईया !

बहुत पुरानी नही, बस ढाई तीन दशक पहले तक परम्परा और प्रवृत्ति थी कि कर्ज लेने वाला मुंह छिपाकर चलता था,क्योंकि कर्ज का अर्थ होता था उसकी लाचारी, जिसका उजागर होना लोग प्रतिष्ठा हनन मानते थे ।जबतक कर्ज चुक न जाए,जवान कुंवारी बेटी सा ह्रदय पर पहाड़ बन वह
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ऐसी वाणी बोलिए ,मन का आपा खोय.....

कहते हैं, ब्रम्हा जी ने श्रृष्टि की रचना के कुछ काल उपरांत जब पुनरावलोकन किया, तो उन्हें अपनी सम्पूर्ण श्रृष्टि नीरव और स्पन्दन्हीन लगी॥ उन्होंने बड़ा सोचा विचार किया कि इतना कुछ रचके भी आख़िर इसमे क्या कमी रह गई है कि जिस प्रकार जलमग्न धरा में पूर्ण
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! ! स्वर्ग ! ! ( व्यंग्य )

देख तेरे लिए तेरी पसंद की कचौड़ी जलेबी लाया हूँ ,एकदम गरमा गरम......चल फटा फट खा ले.......दो दिन से तूने कुछ नही खाया........देख तो कैसे मुंह सूख गया है........चल गुस्सा छोड़...खा ले जल्दी से.......फ़िर हम तुम मजे करेंगे............देख तो कितनी मस्त हवा