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ख्वाहिशें ऐसी

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18 Jun 2010
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सीता की दुविधा, रामकथा का नया रूप

फिल्म समीक्षा: रावणनिर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल माटी वह एरिया है जहां वीरा की सत्ता है। कुछ के लिए वह रॉबिनहुड और कुछ के लिए रावण है। इलाके में जो
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उस खोई हुई बात की खोज

कितनी ही बार इस सीजन में आम खाते हुए आप सोचते होंगे कि आम की मिठास अब वैसी नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। होली खेलते हुए भी हम कहते हैं, होली खेलने में अब वो बात नहीं। और तो और गोभी और आलू की सब्जी तक के स्वाद से हमें शिकायत है कि अब वो बात नहीं रही। आखिर
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सत्तालोभी अराजक धूसर चेहरे

फिल्म समीक्षा: राजनीति -रामकुमार सिंहप्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ का गांधी परिवार से कोई लेना देना नहीं है। सारे पात्रों का कथा-सूत्र महाभारत के करीब है। नीति-अनीति, लालच और मूल्यबोध में वे ‘गॉडफादर’ के पात्रों से मिलते हैं। अर्जुन बने रणबीर कपूर और
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भटकनों में छुपे जिंदगी के मायने

बहुत दिनों तक लगातार मैं एक ही जगह रहते हुए ऊब जाता हूं। सुबह उठते ही वही लोग, दफ्तर में वही चेहरे। वही सब्जी वाला, वही नाई की दुकान पर बजता तेज गाना, परचूनी की दुकान पर मोल-तोल करती मोहल्ले की जानी-पहचानी औरतें। सुबह की वही खुशबू मेरी बालकनी में मिलती
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रॉयल्‍टी के बहाने

मैं नहीं जानता था कि फेसबुक पर एक योजना के बारे में मेरा एक संदेह और लेखक के हित में सोचने की बात पर एक बहस इतना जोर पकड लेगी। मुझे लगा कि एक जवाब आएगा कि ये किताबें बिना पैसा लिए छापी गई हैं। जाहिर है भाई, माया ने यह खर्च वहन किया होगा या उनके सलाहकार
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सरकारी जादू की झप्पी

आप नरेगा के बारे में कितना जानते हैं? जो खबरें छप रही हैं उतना ही उससे ज्यादा कुछ। जिस इलाके में मैं घूमकर मैं आया हूं, वहां जमीनी हकीकत कुछ और है। दरअसल सरपंच समेत गांव के आम लोगों ने यह समझ लिया है कि नरेगा या महानरेगा का पैसा सरकार बांट रही है लिहाजा
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कुतिया की नानी, बारिश का पानी

आइपीएल के मैच प्रसारण के दौरान सिनेमा और टेलीविजन के निर्माताओं को पसीना आने लगता है। सारा देश क्रिकेट देख रहा है। टीवी की यह क्रांति महज एक दशक पुरानी है। इसका सबसे बड़ा खमियाजा बच्चे भुगत रहे हैं। दो ढाई दशक पहले जिन भारतीय लोगों ने अपना बचपन बिता दिया
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घर में ठीक, घाट भी साफ

निर्देशक शंकर अग्रवाल की फिल्म ना घर के ना घाट के इसी हफ्ते रिलीज हुई है और एक साफ सुथरी कॉमेडी फिल्म है। वेलकम टु सज्जनपुर की तरह यहां गांव की वापसी हुई है। पिछले कुछ समय से नए फिल्मकारों ने गांव को फिल्मों में वापस लाने की कोशिश की है। टीवी पर तो गांव
Mar 12 2010 04:46 PM
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थोड़ी राइट, थोड़ी रॉन्ग

फिल्म समीक्षामुक्ता आर्ट्स की ओर से रिलीज निर्देशक नीरज पाठक की फिल्म राइट या रॉन्ग एक थ्रिलर है। एक ऐसा थ्रिलर है जिसकी शुरुआत धीमी है लेकिन धीरे धीरे कहानी खुलने लगती है। यह दो पुलिस अफसर दोस्तों की कहानी है जो अपने ढंग से एक सच और झूठ के साथ जी रहे
Mar 12 2010 04:45 PM
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अतिथि तुम कब जाओगे:

यहां अतिथि भगवान माना गया है लेकिन इस फिल्म का शीर्षक ही यह दुआ कर रहा है कि अतिथि घर छोड़कर जाए। मुंबई में फिल्म राइटर पुनीत के घर उनके दूर के रिश्तेदार लंबोदर चाचा आए हैं। पुनीत और उसकी कामकाजी पत्नी मुनमुन ने शुरुआती दिनों में आदर भाव दिखाया लेकिन
Mar 06 2010 01:31 PM
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फागुन घुस गया है जहन में

फरवरी का आखिरी और मार्च का पहला पखवाड़ा उत्तरी भारत में एक खुशनुमा मौसम का होता है। बसंत पंचमी अक्सर सर्दी के बीचोंबीच आती है लेकिन होली आते आते मौसम एक करवट लेता है। ठिठुरन से रजाई में दुबके रहने और लू के थपेड़ों से बचकर घर में पड़े रहने जैसे अकर्मण्य
Mar 06 2010 01:29 PM
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हुसैन के बहाने सर्जन की दुविधा

चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन यदि कतर के नागरिक होने जा रहे हैं। दोहरी नागरिका का प्रावधान नहीं होने की वजह से क्या वे भारत के नागरिक नहीं रहेंगे? इससे बड़ी शर्मनाक बात किसी सरकार के लिए नहीं हो सकती कि उनका एक विख्यात और संवेदनशील कलाकार को लगातार अपमानजनक
Mar 03 2010 03:32 PM
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सलाम सचिन

जीत हार के गुणा भाग लगाने वाले अंकशास्त्री भी मान ही गए होंगे कि जब एक जुनूनी खिलाड़ी इतिहास बनाने के लिए जूझ रहा होता है तो वह अंकों और ज्योतिष का मोहताज नहीं रहता। सृष्टि के सारे अंक ही ये कोशिश करते हैं कि सचिन के साथ हो लेने में शायद उनकी भी इज्जत
Feb 25 2010 02:55 PM
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अपनी जुबान के सुख

जब अंडमान की 85 साल की बुजुर्ग महिला बोआ सर की मौत की खबर पढ़ी तो यह झटका देने वाली बात थी कि हम कितने सहज तरीके से अपनी परंपरागत जुबानों की उपेक्षा करते हुए एक लालची और स्वार्थी दौड़ के शिकार हो गए हैं। पूंजी ने हमारी संवेदनाओं को खोखला कर दिया है। भाषा
Feb 22 2010 01:42 PM
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निरीह लेखक और ताकतवर निर्माता

कॉपीराईट एक्ट में संभावित संशोधन को लेकर इस समय इंडस्ट्री की असंगठित सी लेखक व गीतकारों की बिरादरी मजबूत तथा संगठित निर्माताओं से अपने हक और रॉयल्टी के लिए संघर्ष कर रही है। जावेद अख्तर और आमिर खान के आमने सामने होने के प्रकरण मात्र से ही अंदाजा लगाया जा
Feb 18 2010 02:31 PM
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प्रेम कि नैया है राम के भरोसे

तपती धूप के बाद हवाओं के साथ तैरते बादल पहाड़ पर टिक जाते हैं। आंखें अभिभूत होती हैं। टिप टिप सी बूंदें बदन को छूती हैं। रोम रोम में सिहरन होती है। बादलों की गरज से कानों में संगीत बजने लगता है। बूंदें तेज होती हैं तो जीभ अनायास बाहर निकलती है। एक बूंद
Feb 15 2010 04:54 PM
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हम होंगे कामयाब एक दिन

करण जौहर अपनी प्रेम मुहब्बत, रोने धोने वाले फार्मूले से मुक्ति की छटपटाहट से बाहर आने की कोशिश कर रहे है। उन्हें हमारे हौसले की जरूरत है। माय नेम इज खान के जरिए वे यह बताना चाह रहे हैं कि दुनिया मे सिर्फ दो ही किस्म के इंसान होते हैं, अच्छे और बुरे। यहां
Feb 12 2010 03:36 PM
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दिल तो बच्चा है जी

बीते सप्ताह के पंाच दिन कब गुजर गए, पता नहीं चला। जयपुर साहित्य उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। शुरूआती सालों के तीन-चार आयोजनों में स्थानीय प्रतिनिघित्व की उपेक्षा, शराबनोशी और अंग्रेजी वर्चस्व जैसी टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग पस्त नजर आए।
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इश्किया: खुरदरे रोमांस का सिनेमा

विशाल भारद्वाज का सिनेमा करण जौहर के रेशमी सिनेमा से अलग एकदम खुरदरा है। उसी खुरदुरेपन में रोमांस है, ईष्र्या है, लालच है। निर्देशक अभिषेक चौबे की यह पहली फिल्म है और उनके हिस्से की तारीफ बनती है। इश्किया दो ऐसे बदमाशों बब्बन और खालूजान की कहानी है, जो
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रण: कांच के जैसे साफ उसूल

कहानी के मोर्चे पर रामगोपाल वर्मा यहां उपदेशात्मक हो गए हैं। रण हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज बनाने की प्रक्रिया की पोल खोलती है। ऐसा नहीं है कि वर्मा यह बात झूठ कह रहे हैं क्योंकि हमारे देश में इस तरह खबर बनाने के उदाहरण खूब मिलते हैं।
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'वीर: फॉर्मूलों का बड़ा हादसा

साल का पहला महीना बीत रहा है और इंडस्ट्री के लिए एक और बुरी खबर है। निर्देशक अनिल शर्मा की 'वीर भी उसी रास्ते पर भटक गई, जहां बॉलीवुड फिल्में अक्सर भटक जाती हैं। भव्यता के बावजूद लचर कहानी ने 'वीर का बलिदान कर दिया है। गदर में पाकिस्तान को गाली दी गई थी
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रेत में, रेल का सफर

मैंने सुना कि एक टिकट जांचने वाला भी ट्रेन के साथ चलता है। बस के कंडक्टर की तरह उससे टिकट लेकर आप रेल का सफर कर सकते हैं। खूब देखने की कोशिश की लेकिन वह दिखाई नहीं दिया। ज्यादातर यात्री मेरी ही तरह इसी उम्मीद में यात्रा पूरी कर गए किटिकटवाला दिखे तो टिकट
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साल का विदाई गीत

यह शहर है और मैं मुसाफिरमेरी पीठ पर लदे बैग में,एक लड़की की मुस्कुराहट,थोड़ी सी भूख,थोड़ा सा लालच,कुछ खंडित से ख्वाब,थोड़ी सी शराबलिए घूम रहा हूं।एक ही शहर मेंअठारह बरस जवानी के चले गए,लड़कियां मिली पर एक भी ऐसी नहींकि दिल से कहूं, हां, यही है।फाके के
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ग्रासरूट पॉलिटिक्स: कुछ नोट्स

देश के कुछ हिस्सों में चुनाव हो रहे थे, और हम लोकतंत्र में यकीन करने वाले लोग अपने कथित जिम्मेदार नेताओं को चुनने में जुटे थे तो मुम्बई में हमारे जवान आतंकियों से युद्ध लड़ रहे थे। टीवी पर जनता के चेहरे कैमरे में थे और नेताओं को बेशुमार गालियां थी। य
Dec 29 2009 11:50 AM
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यह पतन का सूत्रपात है

यदि आप इंसान हैं और सरेराह चलते हुए कोई भिखारी आपसे कहे, भाई साहब एक रुपए का सिक्का दे दीजिए। आप देंगे। वह आपसे कहे, उसका बच्चा बीमार है, एक हजार रुपए उधार दीजिए तो आप बिदक जाएंगे और आपसे यदि वह यह कह दे कि अपना जमीर मुझे दे दीजिए, तो आप उसे एक थप्पड
Dec 29 2009 11:50 AM
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आग्रह

दिल्ली से प्रकाशित कथादेश के सितम्बर अंक में मेरी कहानी पूर्वसंध्या और पाँच यार प्रकाशित हुई है। आपसे आग्रह है कि पढ़ें । कुछ समय बाद उसे ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर दूँगा।
Dec 29 2009 11:50 AM
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बाजार का दु:शासन, नैतिकता की निरीह द्रौपदी

तुम चुप रहो दु:शासन, मैं अपने पति से बात कर रही हूं- टीवी पर दिखाई जा रही नई महाभारत में यह संवाद सुनकर कोई भी आसानी से यह अनुमान लगा सकता है कि जिन लोगों ने नई महाभारत को दिखाने का जिम्मा लिया है, उनकी नजर में यह सास बहू जैसा ही ड्रामा है, जहां विवा
Dec 29 2009 11:50 AM
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पॉलिटिक्स अनिलिमिटेड

अहमदाबाद के धमाके से ठीक एक दिन पहले बंगलौर में धमाके हुए और उससे दो दिन पहले भारतीय संसद में एक भयानक धमाका हुआ। विपक्षी पार्टी की एक खास नेता सुषमा स्वराज की तरफ से सोचा समझा बयान भी आया कि धमाके संसद में हुए कांड से ध्यान हटाने कोशिश हो सकते हैं।
Dec 29 2009 11:50 AM
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खुदा के लिए स्वागत करें

पाकिस्तानी फिल्मकार शोएब मंसूर से जब मैंने पिछले नवम्बर में फोन पर बात की थी तो उनकी दिली तमन्ना थी कि फिल्म खुदा के लिए भारत के लोग देखें। आज उनकी ख्वाहिश पूरी हो रही है। आज भारत में पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए रिलीज हो रही है। जयपुर के एक सिनेमाघर
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हम राजस्थान के लोग

आज अपनी माटी को मोहब्बत करने का वक्त है और यह भावुक क्षण है। किसान से पूçछए, जब वह खेत में खड़ा होता है तो लगता है कि उसकी वह मां की गोद है। सूरज तपे, बादल बरसे, तूफान आए, बाढ़ आ जाए लेकिन उसका खेत उसे मां की तरह पालता है। किसान की जमीन से इस मोहब्बत
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गुजरते साल के अंतिम दिनों में

लेखक गुरूचरण दास की नई किताब "द डिफिकल्टी ऑव बीइंग गुड" पर चर्चा थी। धर्म का सूक्ष्म चेहरा क्या है? पांडव तो अच्छे थे, लेकिन उन्हें जुए में धोखे से हराया गया। राजपाट गया। जंगल में रहना पड़ा। द्रोपदी अपनी शंका युघिष्ठिर से पूछती है, "दुर्योधन तो दुष्ट
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film review: 3 idiots

यह एक अद्भुत अनुभव है। 'मुन्नाभाई एमबीबीएसÓ और 'लगे रहो मुन्नाभाईÓ की कामयाबी से विचलित हुए बिना 'थ्री इडियट्सÓ जैसी और भी खूबसूरत और सार्थक फिल्म बनाकर राजकुमार हिरानी ने संकेत दिया है कि दिल और दिमाग के समन्वय वाले सिनेमा का यह दौर थमेगा नहीं। डेवि
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अवतार : "इको फे्रंडली" विज्ञान फंतासी

बारह सौ करोड़ रूपए की लागत और पंद्रह साल की मेहनत के बावजूद जेम्स कैमरून की फिल्म "अवतार" आपको चमत्कृत ना करे, यह कैसे मुमकिन है। भावना और तकनीक की सिनेमाई यारी-दुश्मनी के बावजूद "अवतार" एक खूबसूरत फिल्म है। यह हमारे समय से आगे की फिल्म है। हम खुशकिस
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वल्र्ड क्लास के सपने

किसी शहर को "वल्र्ड क्लास" बनाने के लिए मुझे नहीं लगता कि जेडीए, नगर निगम या सरकार जैसी गैर-जिम्मेदार संस्थाओं की कोई बड़ी भूमिका होती होगी। मुझे "वल्र्ड क्लास" शब्द से आपत्ति है। यह "थर्ड क्लास" जैसा ध्वनित होता है। केंद्र, राज्य और अब शहर की महापौर
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रॉकेट सिंह : ईंधन कम, आवाज ज्यादा

अब तक छप्पनÓ और 'चक दे इंडियाÓ की कामयाबी के बाद शिमित अमीन से उम्मीदें बढ़ती है। जब फिल्म यशराज बैनर की हो और लेखक जयदीप साहनी तथा लीड में रणबीर कपूर हों तो ये उम्मीद और ज्यादा बढ जाती हैं। पोस्टर और प्रचार देखकर यूं लगता है कि रॉकेट सिंह एक हास्य फ
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चाह नहीं कि नेताओं के माइक पर गाया जाऊं

यह तय बात है कि जिंदगी में कभी फिल्म बनाई तो मैं उसमें देशभक्ति का कोई गाना नहीं रखूंगा। इसलिए नहीं कि इस देश का सम्मान नहीं करता, बल्कि इसलिए कि जब भी चुनाव होंंगे, हमारे नेता उन गानों का दुरुपयोग करेंगे। वे हर चुनाव में ऐसा करते हैं और हमारे मरहूम
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कुर्बान- ऊंची दुकान,सादा पकवान

करण जौहर खेमे के निर्देशक रेन्सिल डिसिल्वा की पहली बहुप्रचारित फिल्म "कुर्बान" की टैगलाइन है कि कुछ प्रेम कहानियां खून से लिखी जाती हैं लेकिन इस फिल्म एक बड़ा हिस्सा "फना" और पिछले साल आई "न्यूयॉर्क" से हूबहू मिलता है। हां, इसमें नया सिर्फ इतना है कि
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ठिठुरती यादों की गुनगुनी परछाईंयां

अपनी ही सांसों से फंूक मारक हथेलियों को गर्म करने की कोशिश। नाक में जलती हुई लकडिय़ों का धुंआ घुस रहा है। चूल्हे के पास यूं बैठने को तीन चार लोगों की ही जगह दिखती है लेकिन 'थोड़ा और आगे सरक।Ó कहते हुए रसोई के चूल्हे के पास दस लोग जमा हो गए। चाचा दूलसि
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हंसो और कहो आल दा बेस्ट

यह तो अब माना ही जा सकता है कि मोहित शेट्टी का कहानी कहने का अपना तरीका है और उसमें वे लोगों को हंसाने की ताकत रखते हैं। दीवाली के मौके पर रिलीज उनकी फिल्म ऑल द बेस्ट में गोलमाल जैसा जादू तो नहीं है लेकिन वह गोलमाल रिटन्र्स के आसपास जरूर ठहरती है। खा
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ब्लू - समंदर में डूबी कहानी

आपने आज से पहले भारतीय फिल्मों में ऎसे दृश्य नहीं देखे होंगे। फिल्म ब्लू का प्रचार करने वालों ने ऎसा कहा है तो जाहिर है उन्होंने झूठ नहीं बोला है। यह सचमुच रोमांचित करने वाला अनुभव है। खासकर हिंदी फिल्मों में लेकिन सौ करोड़ रूपए को पानी में इस तरह बह