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देख कबीरा

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15 Mar 2010
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कैसे भला होगा हिंदी का

सरकार का राजभाषा विभाग और उसके माध्यम से अधिकांश सरकारी विभागों-निकायों यहां तक कि बैंकों में भी सूचना पट्टï टंगे दिखाई पड़ते हैं कि यदि आप हिंदी में कार्य करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी। हिंदी में काम करने और करवाने के लिए प्रेरणा। शब्दों और शब्द
 
सुभाष चन्द्र
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आओ मनाएं नया साल

- विनोद बंसल पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण व अंग्रेजियत के बढते प्रभाव के बावजूद भी आज चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो या जन्म कीे, नामकरण की बात हो या शादी की, गृह प्रवेश की हो या व्यापार प्रारम्भ करने कीे, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न
 
सुभाष चन्द्र
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आईपीएल का मतलब

आईपीएल यानी क्रिकेट का वह फार्मेट जिसमें खेल और बाजार पूरी तरह एक-दूृसरे से गु्रंथा हुआ है। जैसे एक के बिना दूसरा अपंग। आईपीएल रनों की बरसात के कारण जहां दर्शकों को आकर्षित करती है, वहीं प्रायोजक भी करोड़ों रुपये लुटाने को तैयार बैठे रहते हैं। बाजार का
 
सुभाष चन्द्र
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कट्टïरता के चंगुल में अफ्रीका

अपेक्षाकृत अशिक्षित और अविकसित अफ्रीकी देशों में कभी संस्कृति और परंपरा के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर कट्टरता का फैलाव हो रहा है। नतीजतन अलग-अलग कबिलाई इलाकों और अलग अलग मान्यताओं में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच संघर्ष की घटनाएँ भी तेजी से बढ रही
 
सुभाष चन्द्र
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बाजार तो हद पार कर रहा

आज हमारे-आपके हर क्रिया-कलाप बाजार से संबद्घ है। हम क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, क्या करते हैं - सब बाजार तय करने लगा है। महानगरों से शहर और शहर से गांव - हर जगह यही हाल है। और बाजार है कि सुरसा की भांति अपना दायरा बढ़ाता ही जा रहा है। न कोई नैतिकता, न
 
सुभाष चन्द्र
Mar 08 2010 11:20 AM
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अनुभा का खत

अनुभा मकान के दूसरे तल्ले में अपनी सहेलियों से घिरी बैठी है। नीचे उसके विवाह की तैयारियां हो रही थीं पर वह इससे बेपरवाह खामोश बैठी सामने दीवार की ओर देख रही थी जिस पर बकरी को ले जाते हुए एक कसाई का चित्र उभर-उभर कर आता था।तब वह लगभग आठ साल की थी। एक बकरी
 
सुभाष चन्द्र
Mar 04 2010 08:45 AM
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विकास का वितंडा

राजनीतिक सत्ता सामाजिक बदलाव का एक औजार जरूर है, लेकिन क्या यह व्यक्तियों को सत्ता में बदल देने का भी औजार है? इसे हमारे देश के तमाम राजनेताओं ने साबित किया है कि सत्तातंत्र की लगाम हाथ लगते ही उनकी दिशा अपने स्वार्थों और नफे-नुकसान के हिसाब से तय होने
 
सुभाष चन्द्र
Mar 03 2010 09:28 AM
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एफ.एम. का मिर्ची बम

देश को बजट मिल गया। सत्ता में बैठे नेताजी सब खुश हैं, उनके दोनों मंत्रियोंं ने एकदम धांसू बजट पेश किया है, तो विपक्षी नेताओं की परेशानी यह है कि बजट का पोस्टमार्टम कर वह जनता को जो उसका सड़ा-गला पार्ट दिखा रहे हैं, उसको देखकर जनता को हार्ट अटैक नहीं हो
 
सुभाष चन्द्र
टैग: बजट
Mar 02 2010 11:38 AM
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मनमोहन का इस्तीफा, सोनिया ने संभाली गद्दी

बहुत हुआ। अब नहीं चलेगा। पांच साल से अधिक का मौका दिया। दोबारा भी कुर्सी थमाई। फिर भी न देश सुधरा और न परिवार। एक ही तो बेटा था, जिसकी शादी भी नहीं करा पाए। तो भला क्यों बनाए 'रखवारÓ। ऐसे थोड़े ही होता है। लोग तो यही कहते हैं न कि सरकार का रिमोट जब हाथ
 
सुभाष चन्द्र
Feb 27 2010 02:36 PM
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विलासिता के लिए मातृत्व का सौदा

औरतों को लक्षित करके किसी मशहरोमारुफशायर ने कहा है कि- मैं कभी हारी गई, पत्थर बनी, गई बनवास भी, क्या मिला द्रोपदी, अहिल्या,जानकी बनकर मुझे। इस पंक्ति को आधुनिकता के चादर में लपेट कर आज की नारी तमाम वर्जनाओं को तोडऩा चाहती और उन्मुक्त आकाश में विचरण करना
 
सुभाष चन्द्र
Feb 25 2010 02:39 PM
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उ का है गोरी...

कभी-कभार ऐसा होता है कि मन नहीं लगता। अब नहीं लगता तो नहीं लगता। ऐसे में हम त दोइए काम करते हैं। एक कहीं घूमने भाग जाते नहि त इंटरनेट पर बैठिए। न कोनो चिक-चिक, झिक-झिक। कल अइसन ही हुआ। कुछेक दोस्तों के संग हंसी ठिठोली शुरू हो गई।अब, आप लोगन के त दिमाग
 
सुभाष चन्द्र
Feb 24 2010 11:43 AM
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तालिबान को नहीं चाहिए शांति

अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ चल रही लड़ाई के बीच तालिबान ने एक बार फिर करजई के शांति समझौते की पेशकश को ठुकरा दिया। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने तालिबान के साथ शांति समझौते की बात कही थी। इससे पहले भी तालिबान ने पाकिस्तान के संग भी शांति
 
सुभाष चन्द्र
Feb 23 2010 08:53 AM
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बड़े कैनवास पर आने की कोशिश

भाजपा में नई पीढ़ी को कमान देने के प्रयास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी जादू की डिबिया से जिस अल्पज्ञात राजनेता को लोगों के सामने पेश किया है वे नितिन गडकरी आज देश की नंबर दो पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सिंहासन पर आरूढ़
 
सुभाष चन्द्र
टैग: भाजपा
Feb 20 2010 09:41 AM
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पानी का मतलब

पानी का मतलबदुनिया को मतलब देना हैऔर आदमी को बचाना हैमतलबी होने सेपानी का मतलबएक-तिहाई भू-भाग हैलेकिन घॅंूट भर की प्यास कोसूखने नहीं देना उससे भी बड़ी चुनौती हैपानी का मतलबकविता में तैनात मतलब को छुटटी देना हैपानी का मतलब'ठंडा मतलब कोका कोलाÓ नहींप्यास
 
सुभाष चन्द्र
टैग: पानी
Feb 19 2010 11:31 AM
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सपना बेचिए, करोड़ों कमाइए

अपने अस्तित्व काल से ही झारखंड आर्थिक विकास के लिए केंद्र के लिए मुंह ताकता रहा है। विकास की धारा यहां नहीं बहती। हर चुनाव में स्थानीय विकास मुद्दा बनता है, और चुनाव बाद सरकार गठन के बाद गौण हेा जाता है। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि यहां किसी का भी विकास
 
सुभाष चन्द्र
Feb 14 2010 11:05 AM
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कैसा वेलेंटाइन हो आपका, तय करें

प्रेम प्रदर्शन का नहीं दर्शन का विषय है...
 
सुभाष चन्द्र
Feb 13 2010 09:02 AM
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कम हो रहे हैं नागा साधु

दिन-दुनिया से कोई सरोकार नहीं, अपने में ही मदमस्त। देह पर भभूत लपेटे, बेतरतीब बढ़े बाल-नाखून, हाथों में त्रिशूल-ओ-कमण्डल। सामाजिक संस्कार ओ रीति-रिवाज से वास्ता नहीं। निर्वस्त्र, निर्गुण। स्वयं को आदिदेव महादेव के अनुचर बताने वाले - नागा साधु ही तो हैं।
 
सुभाष चन्द्र
टैग: साधु
Feb 12 2010 01:47 PM
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राजा का है हाल बेहाल

सिमटते जंगल और शिकारियों पर कोई अंकुश नहीं होने से राष्ट्रीय पशु और जंगल के राजा बाघ की संख्या लगातार कम होती जा रही है। देश के सभी अभारण्य में लगातार इनकी संख्या चिंता का सबब बनती जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीसवीं सदी की शुरूआत में देश में 40
 
सुभाष चन्द्र
Feb 11 2010 09:03 AM
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प्रभाष जोशी पर लिखी किताब का लोकार्पण इसी महीने

हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी पर लिखी गई एक नई किताब का लोकार्पण इसी महीने होने जा रहा है। मध्यप्रदेश फाउंडेशन द्वारा नई दिल्ली के इंडिया हेबीटेट सेंटर में पुस्तक लोकापर्ण समारोह का आयोजन किया जाएगा। प्रसिद्घ गीतकार-गजलगो जावेद अख्तर व
 
सुभाष चन्द्र
Feb 10 2010 12:27 PM
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सीधी ऊँगली से

वह पढ़ी-लिखी समझदार लड़की थी। दहेज की कट्टïर विरोधी, उसने यह शादी की ही इस शर्त पर थी कि दहेज की कोई माँगें नहीं होगी। उसके पिता ने अपने हैसियत के हिसाब से जो भी बन पड़ा, दिया था।कुछ दिन बीते भी। उसकी सास ने उसे दहेज के ताने देने शुरू कर दिया।तुम्हारे
 
सुभाष चन्द्र
Feb 10 2010 08:20 AM
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दिव्य प्रेम का अलग संसार है

प्रेम में हम सिर्फ अपने प्रियतम के बारे में सोचते हैं। इस अवस्था का वर्णन करते हुए कई लोग कहते हैं कि उन्हें भूख नहीं लगती, नींद नहीं आती। हर जगह उन्हें अपने प्रियतम का ही चेहरा दिखाई देता है। हर वस्तु उन्हें अपने प्रियतम की याद दिलाती है। अगर उन्हें वह
 
सुभाष चन्द्र
टैग: प्रेम
Feb 09 2010 03:36 PM
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मुश्किल में बीमारी

भ्रष्टाचार जैसी महामारी कोई नई बिमारी नहीं है और ना ही मात्र बिहार में इसने जड़ जमाया हुआ है बल्कि ये बिमारी कमोबेश हरेक राज्य में है। लेकिन आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि जब सरकारी महकमा ही शराब माफिया बन जाए तो क्या किया जाए। दरअसल, बिहार में
 
सुभाष चन्द्र
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मधुसागर

पाप-पुण्य के बीच खिंचा है,युगों-युगों से ही पाला,पुण्य, पुण्य से टकराकर अब,भड़काये भीषण ज्वाला।दावानल बड़वानल युग भी,कम है ऐसी ज्वाला से,तभी बुझेगी यह ज्वाला जब,पियें पुण्यकर्ता हाला।सत्य सत्य से, न्याय न्याय से,हुआ द्रोह करनेवाला,इस कारण ही पूर्ण न
 
सुभाष चन्द्र
Feb 07 2010 01:11 PM
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ना...ना... नरेगा

राष्ट्रीय रोजगार योजना यानी नरेगा के तहत हर महीने साढ़े तीन हजार करोड़ से कुछ ज्यादा और साल भर में 44 हजार करोड़ का प्रवधान किया गया । लेकिन पहले सौ दिन में 12 हजार करोड़ रुपये नरेगा में देकर सरकार ने क्या किया, इसका कोइ लेखा-जोखा नहीं है । 2008 में भी
 
सुभाष चन्द्र
टैग: नरेगा
Feb 06 2010 10:02 AM
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क्षेत्रीयता को पलीता

मराठी मानुष बनाम उत्तरी भारतीय लोग। यह मुद्दा शिवसेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बनता जा रहा है, और इससे भगवा खेमा दो फाड़ हो गया है। साथ ही कांग्रेस भी इसमें परोक्ष रूप से कूद कर बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अभी से अपनी
 
सुभाष चन्द्र
Feb 05 2010 10:05 AM
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अंगुली में अंगूठी, अंगूठी में दरख्त

लोगों को समझना होगा की प्रकृति और इंसानी संसार में ज़मीन आसमान का फ़र्क है । पर्यावरण तभी सुधरेगा जब हम अपने खुद के प्रति ईमानदार होंगे । हमारी दुनिया में हर चीज़ पैसे के तराज़ू पर तौली जाती है,लेकिन प्रकृति ये भेद नहीं जानती । देश- दुनिया में न जाने
 
सुभाष चन्द्र
Feb 04 2010 10:10 AM
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रोशनी अभी बाकी है...

आठ लाख बच्चे अभी भी बिहार में स्कूल नहीं जा पाते हैं, जबकि पिछले चार वर्षों में ये आंकड़ा 25 लाख से घटकर आठ लाख पर पहुँचा है।बिहार में सरकार बच्चों के लिए मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिलाने वाले क़ानून को अगर सही मायने में लागू करके दिखा दे तो
 
सुभाष चन्द्र
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अमर का नया ठौर

सपा से निकाले गए अमर सिंह को लेकर कई राजनीतिक दलों के दरवाजे खोले गए थे। राकांपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस की भी चर्चा थी, लेकिन फौरी तौर पर 'लोकमंचÓ की घोषणा कर कयासों पर विराम लगाया। कल तक जो पार्टी के हरेक निर्णय के सूत्रधार होते थे, उन्हें अब कोई
 
सुभाष चन्द्र
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अपने आप कहते हैं, वे दलित हैं

हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक अनिल चमडिय़ा, जो कुछ ही माह पूर्व वर्धा गए थे, पत्रकारिता पढ़ाने। दो दशक से अधिक का उनका जनपक्षीय अनुभव, जिसमें जनसरोकार कूट-कूट कर भरा हुआ था, चंद महीनों में छीजता दीख रहा है। ऐसा नहीं है कि यह केवल मैं कहने की
 
सुभाष चन्द्र
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प्रिय

तुम्हारी आँखेवैसी नहींजिन्हें कह सकूं नशीलीतुम्हारी मुस्कानभी तो सजावटी नहींतुम्हारे दांत नहीं हैंमोतियों जैसेशक्लो-सूरत से भीपरी नहीं हो तुम।पर फिर भीसबसे बढ़कर हैंतुम्हारी भावनाएं
 
सुभाष चन्द्र
Jan 29 2010 10:29 AM
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निगोड़े पुलिस से दूर भगोड़े

चोर-पुलिस का संबंध एक खेल की तरह ही है, जब बाजी जिसके हाथ लगा वह 'मीरÓ होता है। जैसे, बच्चे अपने दोस्तों के संग चोर-पुलिस का खेल खेलते हैं। उसी तरह अपराधी भी पुलिस को चकमा देते हैं और भाग खड़े होते हैं। हद तो तब होती है जब न्यायालय ताकीद करती है और पुलिस
 
सुभाष चन्द्र
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ये तो प्रभाषवाद ही है

वाल्मीकि रचित रामायाण और तुलसी के रामचरितमानस में 'राम राज्य Ó और 'मर्यादापुरूषोत्तम रामÓ का बखान किया गया। राम राज्य आएगा, लोग कहते आ रहे हैं, लेकिन कब, कोई नहीं जानता। उसी प्रकार आज की वह पीढ़ी जो पत्रकारिता में आई है, विशेषकर हिंदी पत्रकारिता में उसके
 
सुभाष चन्द्र
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देवदारू

लंबी कतारों वाले पेड़ से पूछना हैतुम कब से खड़े हो?तुम इतने जवान होहरे-भरेकि लगता ही नहीं तुम मेरे दादा के जमाने सेखड़े होपत्तियों के तिकोने मुखकितने ताजे लगते हैंछाल खरोंचने परताजा दूध छलक आता हैदेवदारूतुमने वे राजा लोग देखे थेउनके बर्बर कारिंदेआजादी के
 
सुभाष चन्द्र
Jan 23 2010 10:14 AM
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दलाईलामा और तवांग यात्रा

प्रकृति अनन्त शक्तियों का भण्डार है । वैज्ञानिकों ने वायुयान, रेडियो, विद्युत, वाष्प आदि के अनेक आश्चर्य जनक आविष्कार किये हैं और नित्यप्रति होते जा रहे हैं पर प्रकृति का शक्ति भण्डार अनन्त और अपार है कि धुरधंर वैज्ञानिक अब तक यही कह रहे हैं कि हमने उस
 
सुभाष चन्द्र
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आयोग क्यूँ !

लोकतांत्रिक प्रणाली में 'लोगÓ की प्राथमिकता होती है। सो, लोगों की मनोदशा का अंदाजा लगाकर किसी भी अप्रिय घटना के बाद शासनपक्ष द्वारा फौरन जांच आयोग का गठन किया जाना रस्मअदायगी बन चुकी है। जिसका हश्र जनता को पहले से ही पता होता है। आखिर क्यों? अहम सवाल है।
 
सुभाष चन्द्र
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आँसुओं का न कहें...

पहले आंसुओं को संभालने-संजोने की बात होती रही है लेकिन अब आप जल्दी ही आंसुओं को गहनों की तरह पहने लोगों को भी देख सकते हैं। युवतियों में आजकल जिस तरह फैशनेबल कपड़ों का क्रेज बढ़ रहा है, उसी तरह डिजाइनर ज्वेलरी भी उन्हें लुभा रही हैं। कुछ ऐसा ही शगल आज के
 
सुभाष चन्द्र
Jan 15 2010 10:06 AM