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15 Jun 2010
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चारोक्ति

1,हां मैं हारा हुआ हूंअब बताओ कैसे जीतोगे मुझसे? मगर सावधान रहना तुमजीत स्थाई नहीं होती। और न हार....।2,गुरुर के लायक होसबकुछ तो है तुम्हारे पास,इसलिये आंखे भी बन्द है,और मैं गुरबत में तुम्हे खुली आंखों से देख रहा हूं।3,सुना हैपुण्य भी कटते हैंचलो आज मैं
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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आदमीयत से भरी सोच

सबकुछ उल्टा-पुल्टा है। लिखना या पढना कठिन हो चला है। अब यह देखने वाली बात है कि इमानदारी और मेहनत से भरा प्रतिभायुक्त पिचका पेट आखिर कितनी और पराजय पचा सकता है? कब तक बडे पेट वालों की डकार अपने नथूनों में भरकर चाटुकार अपनी चमक बिखेरते रहेंगे? कोई एक तो
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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तीन कवितायें

1, प्रतिक्षा के अग्नि कुंड मेंसमय की समिधायेंडाल-डाल उम्र को हवन कर दियाऔरइस तप का प्रतिफल ये मिला किअब आस्तिक न रहा।2, विरह की लपटों से झुलसी लगभग राख हुई उम्रइस नंगी-रुखीहवा के बदन से लिपटजीवन के चारों ओरभंवर बनानाचने लगी हैमानों यह अंतिम नृत्य साधना
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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तेरी प्रतिमा

बहुत दिनों से रागमयी कोई रचना नहीं की। दिमाग भी ऐसा है कि जिसमें मज़ा आता है वही करता रह जाता है, आलेख या समीक्षायें लिखने में रमा तो लिखता ही रहा, बगैर यह सोचे कि उनके पाठक ज्यादा नहीं, सीधी, सपाट कवितायें की तो बस करता ही चला गया, बगैर यह सोचे कि उसके
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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गांठे

जन्म के साथजिन्दगी की तरहएक सीधी-सपाट डोर थमाई थी "उसने",कहा था, इसके सहारेइसीकी तरह तुम भी चलना।अभी चलना शुरू किया ही था किरिश्ते-नातों की तमाम गठानें बान्धनी भी शुरू कर दी।जीवन को जीने, उसे मज़बूत बनाने के चक्कर मेंकितनी गांठे बान्ध ली..।और जब मुड कर
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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निवाला

सुबह होने के साथ हीअट्टहास करताछा जाता है राक्षसी दिन।जैसे भूखा हो बरसों से।अपने नुकीले दांतों के बीच रख कर चबाता हैऔर एक एक करकेखाने लगता है हम सबको।अपने लवणयुक्त चिपचिपेलार के साथ उतारता हैअन्धेरी गर्म कोठरी से पेट में।फिर आंतों के अजगरी कसाव सेदबाता
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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ज्ञान का अधिकार ज्यादा जरूरी

मैं एक कार्यक्रम में था। "शिक्षा के अधिकार पर चिंतन"। कुल पांच-छह वक्ता। अच्छे वक्ता थे। मुझे भी बोलने का अवसर मिला। हालांकि मैं बोलने या वक्ता के रूप में कहीं ज्यादा आता-जाता नहीं, क्योंकि सिर्फ बहस पर, विशेषकर औपचारिक बहस पर मैं विश्वास नहीं करता
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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डोर

यह 150 वीं पोस्ट है, पता ही नहीं चला। खैर.., काफी दिनों से काव्यात्मक कुछ लिखा नहीं,वैसे मूलत: मैं तो आलेख लिखने वाला ठहरा, काव्यात्मक रचना मेरे बस की नहीं, सिर्फ प्रयासभर करता हूं। हां, कवितायें पढने में बहुत रस लेता हूं। अपने चन्द लेखक कवि हैं जिनके
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मेरी नज़र में-नाटककार चरणदास सिद्धू (अंतिम भाग)

14.3.1997 को डॉ. राजेन्द्र पाल को दिये गये एक साक्षात्कार में डॉ.चरणदास सिद्धू ने नास्तिकता पर अपने विचार प्रकट किये हैं। ( नाट्यकला और मेरा तजुरबा, पृ.141) यह मुद्दा वाकई गम्भीर है। डॉ.सिद्धू नास्तिक हैं। पहले नहीं थे, बाद में हुए। ( इंगलिश ऑनर्स करते
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मेरी नज़र में-नाटककार चरणदास सिद्धू (भाग-2)

अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मेरी नजर में- नाटककार डॉ.चरणदास सिद्धू

किसी भी व्यक्ति को उसकी किताब से पूरा-पूरा नहीं जाना जा सकता। वैसे भी किसी व्यक्ति को पूरा कब जाना जा सका है, हां उसके करीब रह कर उसकी प्रकृति, उसका स्वभाव, उसकी आदतें आदि जानी जा सकती है और जब ऐसे व्यक्ति किसी के बारे कुछ लिखते हैं तो हम उक्त व्यक्ति के
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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उथले हैं वे जो कहते हैं

किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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सृष्टि सर्जन का पहला मुहूर्त

बचपन से ही सृष्टि के सन्दर्भ में जानने-समझने की जिज्ञासा रही है। यह विषय मेरे लिये हरहमेश रोमांचित कर देने वाला रहा है। बहुत कुछ पढा-लिखा, अध्ययन किया, साथ ही इस सन्दर्भ में पंडित, ज्योतिष, वैज्ञानिक, ज्ञानियों आदि इत्यादि से समय समय पर अपनी जिज्ञासा
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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फिर दिल की नहीं, दिशा की जरूरत है

हॉकी का विश्वकप चल रहा है और भारत अपने तीन मैचों में सिर्फ एक पाकिस्तान से जीता है बाकी के ऑस्ट्रेलिया और स्पेन से बुरी तरह हारा। यानी उसके सेमीफाइनल के रास्ते अब कठिन हो चुके हैं। आज उसका इंग्लैंड के साथ मुकाबला है। इधर हीरो होंडा के विज्ञापन में दिखाया
 
अमिताभ श्रीवास्तव
Mar 05 2010 11:43 PM
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जो प्रेम की हो ली, वो है होली

रुकिये.....इतना बडा आलेख देख कर भागिये मत। सच पूछिये तो आनंद आयेगा। होली के पर्व पर इस तरह के आनंद को पाने की भी चेष्ठा होती है, तभी आप मेरे ब्लोग पर आये हैं। पूरा पढने का साहस करें, पसन्द आयेगा। तब तक मैं आपके और अन्य ब्लोग से होकर आता हूं। -आनंद में
 
अमिताभ श्रीवास्तव
Feb 27 2010 05:55 PM
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आंखों में कल का सपना है

ओफिस से रात में लौटना होता है, अमूमन आधी रात चढ जाया करती है। जब गांव वाले अपनी नींद को बिदाई देने के लिये अंतिम खर्राटे लिया करते हैं तब मैं अपने घर पहुंच कर या तो दरवाजा खटखटाता हूं या फिर बेल बजाता हूं। अज़ीब सी जिन्दगी है महानगरों की। खैर..लौटा ही था
 
अमिताभ श्रीवास्तव
Feb 24 2010 12:01 AM
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रंगोली

अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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जनता या जमूरा?

किसी को अपनीफिल्म चलानी है,पार्टियों को राजनीति करनी हैचैनलों को मसाला कूटना हैऔर आपको?आप तो ज़मूरे हैं।इशारों पर नाचने वाले ज़मूरे,इनके धंधों मेंबेमोल बिकने वाले ज़मूरे। क्या ज़मुरुओं की कोई औकात होती है?मुम्बई पिछले कुछ दिनो से हैरान है। आप जानते हैं क्यों
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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Feb 11 2010 12:09 AM
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चीनी कम

अमिताभ बच्चन और तब्बू की फिल्म थी 'चीनी कम'। मैने देखी नहीं। फिल्म देखने का शौक नहीं है सो नहीं देखी। उसकी कहानी भी पता नहीं। किंतु देश में चल रही सरकारी फिल्म 'चीनी कम' से जरूर दो चार हो रहा हूं। लगता है यह फिल्म ज्यादा लम्बी है। खत्म होने का नाम नहीं
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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शुक्रिया जनसत्ता

जनसत्ता के 5 फरवरी के अंक में मेरी पोस्ट 'मुश्फिक़ की फिक़्र" प्रकाशित की गई। इसे जनसत्ता ने ब्लोग से ही उठाया। यह खुशी की बात है कि पत्रकारों मे अभी भी कुछ ऐसे लोग बचे हैं जो अच्छा लिखने का, लिखते रहने का हौसला देते हैं और रचनाओं की कद्र करते हैं। उन्हें
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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विडम्बना

गधों और घोडों केखुरों के बीचरौन्दी जा रही प्रतिभा।नोंच-नोंच उसे खा रहे गिद्धआसमान नाप रहे।सिसकियां भीचाटे जा रहे रात के अन्धेरे मेंचमगादड।खरगोश सा कोमलमुलायम मांस वालाईमान,कब तक कहां-कहां फुदकेगा?आखिर सीधे खडेकान पकड के उसे भून दिया जायेगासरकारी भट्टी
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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'मुश्फिक' की फिक्र

जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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"दिल्ली कितनी दूर"?

कल 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। और इधर जब मैं कुछ पुरानी किताबें अपनी आदतानुसार टटोल रहा था तो मिले कविवर मधुर जी। जी हां, बलिया के श्री रामसिन्हासन सहाय 'मधुर'। इनसे हिन्दी साहित्य पढ्ने वाले परिचित होंगे। या मेरे जैसे कबाडी। खैर..मधुरजी की कविताये
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मेरी प्रिय पुस्तक में से----

जब भी कभी खालीपन का अहसास हुआ, मुझे अपनी रुचिकर किताबों ने सम्भाला। जब भी कभी मन भारी होता है मैने हमेशा किताबों की शरण ली है। किताबें मुझे ज्यादा प्रियकर इसलिये भी लगती है कि उनमे स्वार्थ नहीं होता, उनमें छल नहीं होता, कपट नहीं होता, वे जैसी भी होती हैं
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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मेरा प्रेम

उसे न कभी देखा,न मिला औरन ही जाना। हां,अपने आसपासउसके होने का अहसासहमेशा रहता है।हवा संग वोकभी शरीर से लिपटती हैतो कभी खुशबू बननथुनों से होकरसीधे हृदय तकजा उतरती है। रोमांचित मनमस्तिष्क में बैठउसकी आकृतियां उकेरने लगता है।और जब इन आकृतियों कोकैनवास पर
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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नए साल का सूरज

चलिए मै भी मना लेता हूँ,या यूं कहू मान लेता हूँ इस नव वर्ष को| वैसे तो रोज़ ही उगता है अलसाते हुए और किसी मजदूर की तरह दिनभर थक कर चूर शाम होते होते ढह जाता है वो, अब खुमारी में डुबो को कहा दीखता है नए साल का सूरज?
 
अमिताभ श्रीवास्तव
Dec 31 2009 05:31 PM
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कौन दे गया शाप

स्वाईन फ्लु' तेज़ी से बढ्ने लगा है। मुम्बई के हालात कुछ ठीक नहीं कहे जा सकते। आप यदि अस्पताल की ओर देखें तो पायेंगे बदहवास लोगों की भीड और परेशान चेहरे हर कोने पर बिखरे पडे हैं। फ्लु की तादाद भले कम हो पर दहशत हरकिसी के सिर पर सवार है। क्या बाज़ार,क्या
 
अमिताभ श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:47 AM
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राजनीति का त्रिफला

सरकार सोई या बीमार नहीं है, वो जाग रही है। उसने तो सत्ता, नोट और बाहुबल के त्रिफला चूर्ण से अपना हाजमा सुधार रखा है। वो पचा लेती है तिल-तिल कर मर रहे भूखे लोगों का दर्द। वो देखती है बिल्कुल करीब से महंगाई के इस दौर में गरीब का आटा गिला होते। आंकडे एक
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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कुपोषण

रीढ से चिपके पिचके पेट लिये, कंकाल हो गये चमडी चढे शरीर वाले इन बच्चों की आंखों के आंसू भी सूख कर गीजड बन चुके हैं, जिन पर भिनभिनाती मक्खियों को तो उनका भोजन मिल जाता है किंतु भूख की आग में दहन हो रहे इन नन्हे भविष्यों को एक दाना तक मुहाल नहीं है। इन
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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विरह

अमूमन प्रेम की समिधायें विरह के अग्निकुंड में अर्पित होते देखी हैं। सदियां बीत गई कभी किसी अग्निदेव को प्रकट होते नहीं देखा, न ही देखा प्रेम का यौवन लौटते हुए, न उसे किसी वरदान से दमकते हुए। हां, देखा तो बस 'स्वाहा' का उच्चारण करते हुए निच्छल हृदयों
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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कांक्रीट क्रांति

यादों ने जहां जन्म लिया वह तीर्थ स्थल कांक्रीट क्रांति में शहीद हो चुका है। किंतु मस्तिष्क के किसी कोने में धुन्धलाती सी तस्वीर है, जिसे मैं चाह कर भी कागज़ पर नहीं उकेर सकता। कैसे उकेरुंगा? क्या कडकडाती ठिठुरती वह रात, शहर के बाहर की सुनसान अन्धेरे म
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात

आज का ही तो दिन था, कुर्ला रेलवे स्टेशन के बाहर 'नुक्कड' पर जब 'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात हुई तो यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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सुशीलजी की 'अमिताभ यात्रा"

यह भी अज़ीब संयोग है कि कानपुर में भारतीय क्रिकेट टीम ने अपनी 100 वीं टेस्ट जीत अर्जित की और मैने ब्लोग पिच पर अपनी 100 वीं रचना। हालांकि टीम इंडिया ने 1932-33 से अपने टेस्ट जीवन की शुरुआत की थी और 1952 में पहली जीत हासिल की थी। मैं 2008 में ब्लोग पिच
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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वाह क्या विडम्बना है

मेरे दफ्तर पहुंचने से पहले ही वो वहां मौज़ूद था। मुझसे एकाध इंच लम्बा यानी वो होगा कोई 6 फिट 1 या 2 इंच का। गठीला बदन। साफ झलकता था कि कोई स्पोर्ट परसन है। हंसता हुआ चेहरा, उसकी मुस्कान में एक अलग ही शान थी,अपनत्व का भाव था, जिसने मुझे उसकी ओर आकर्षित
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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आटा और रोटी

आटा गूंथना जीवन मथने जैसा ही तो है| उसकी लोई बना बेलन से आकार देना और गर्म तवे पर रख सेंकने भर से रोटी नहीं बनती, आग पर तपना भी होता है और इस तरह जलना होता है कि कही चिटक तक न लगे| जीवन क्या ऐसा नहीं? फिर दुःख ... कहते है रोटी को चबा चबा कर खाना पाचन
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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ओहदे वाला आदमी

ओहदे वाला आदमी 'आदमी' नहीं होता वो 'ओहदे वाला आदमी' होता है। 'आदमी' होने के लिये सिर्फ 'आदमी" होना होता है। और ओहदे पर जो 'आदमी" होता है वो ओहदे के नीचे होता है, दबा सा। उपर उसके होता है अहम और दम्भ का चमकता हीरा। हीरा... जैसे मिलावटी चीजों पर ब्रांड
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं

कल मुम्बई में अफरा-तफरी मच गई। मध्य-रेल अचानक ठप्प हो गई। सुबह के उस समय यह सब हुआ जब लाखों लोग अपने कार्यस्थल की ओर रवाना होते हैं। एक निर्माणाधीन पुराना पाईपलाइन वाला पुल टूट कर लोकल ट्रेन पर गिर जाता है, हाहाकार मच जाता है। मचे भी क्यों नहीं आखिर
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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365 गेंदो में 93 रन

गेंदो में 93 रन, टेस्ट मैचों के लिहाज़ से ठीक-ठाक कहे जा सकते हैं। क्रीज़ पर ड्टे रहना और शतक के करीब रहना भी कम रोमांचक नहीं होता है। टेस्ट मैच वैसे भी क्रिकेट का असली रूप होता है, इसमे क्रिकेट की कलात्मकता, तकनीक निखर कर सामने आती है और ऐसा माना जाता
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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एक ये भी दीवाली है...

फटे कपडे वाला पसीने से लथपथ बदहवास कहां दौडा जा रहा है, रुक... अबे रुक जा...। बच के कहां जायेगा बे बोल...क्यों भाग रहा है और ये तेरे हाथ में.... क्या है, बता.... चोर कहीं के। पकडे रखना मुंडेर पर चढा था ये वो तो अच्छा हुआ कि दीये जल रहे थे दिख गया...।
 
अमिताभ श्रीवास्तव
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शांति के नये 'बाबा', जय हो ओबामा

ओम से नहीं, अब शांति ओबामा से मिलती है। इससे बडा चमत्कार और क्या हो सकता है कि जिसे दुनिया आठ-नौ महीने पहले तक जानती नहीं थी उसे शांति का सबसे बडा दूत बना दिया गया। जिसने अपने लिये, अपने कुनबे के लिये लडाई लड कर सत्ता हासिल की उसे दुनिया का महान शांत
 
अमिताभ श्रीवास्तव