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19 Mar 2010
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उनकी आस्तीन में भी सांप पलते होंगे!(वयंग्य)(कविता)

जिस तरह मिलते है हम उनसे,उसी तरह वो भी हमसे मिलते होंगे!जैसे हमारी आस्तीन में पले हैं,उनकी आस्तीन में भी सांप पलते होंगे!हमे देखते ही खिल उठता है चेहरा उनका भी,हमारी बनावटी हंसी पर अन्दर ही अन्दर वो भी जलते होंगे!न तो रंज है कोई न गिला-शिकवा ही
 
kunwarji's
टैग: hindi poem
Mar 19 2010 07:24 PM
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क्या हैडली को सिर्फ उम्र-कैद की सजा से ही "भारत" को संतुष्टि मिल जायेगी?

मै जानना चाहता हूँ क्या हैडली को सिर्फ उम्र-कैद की सजा से ही "भारत" को संतुष्टि मिल जायेगी?वो क्या है?मै समझता हूँ ये बात सभी जानते है!क्या उसने जो किया है और जो वो कर सकता
 
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अब तो जागो...(कविता)

एक जाती,एक थाती,पाती एक क्यों नहीं,सब रहे जाग,है एक आग,राग एक क्यों नहीं?इष्ट एक,अभीष्ट एक,शीष्ट एक क्यों नहीं?जोश एक,रोष एक,होश एक क्यों नहीं?     क्यों नहीं मंथन
 
kunwarji's
टैग: ek aahvahaan
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मुझे पीने का शौंक नहीं,बस पी लेता हूँ!...

मुझे पीने का शौंक नहीं,बस पी लेता हूँ!सोचता हूँ आज फिर कोई मार दे मुझे,अपने हिस्से के गम सारे उधार दे मुझे,निगाह-ए-खंज़र उपहार दे मुझे,गौर करे ना करे पर सुने तो,हमे ना बताये पर हमे चुने तो,पूरे ना हो सपने सही हम बुने तो,शोख अदाओं का हसीं सा खुमार दे
 
kunwarji's
टैग: hindi poem
Mar 17 2010 07:08 PM
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नाम सब से अच्छा "तम्बकतुरा"!...(हास्य-वयंग्य)

एक गरीब के घर गलती से लड़का पैदा हो गया!क्षमा चाहूंगा,गरीब अधिकतर गलती ही करता है ना इसी लिए यहाँ भी 'गलती से' निकल गया!हाँ तो वो पैदा तो हो गया पर अब उसका नाम क्या रखे जी?बड़ा ही कठिन सा प्रशन!हमारे-तुम्हारे लिए तो नहीं पर उस गरीब के लिए
 
kunwarji's
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फर्क तो पड़ता ही है....(कविता)

जेठ के महीने जबथक जाती है आँखेंबादल कि राह देख-देख,तब तक आस भी सब्र में तब्दील हो चुकी होती है!पर आसमान पर ही टिकी रहती हैवो थकी आँखें!तभी दिखाई दे कोईउमड़ती-घुमड़ती घटा,और छा जाए,इक पल में पूरे नभ पे,सूरज भी नहीं होता ऐसे पलों में,जो कुछ पल
 
kunwarji's
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हाल चाल ठीक ठाक है.........(एक और गीत)

पता नहीं कैसे पुरानी फिल्मो में आज के हिसाब के गीत लिखे जाते थे!आज फिर एक गीत आपके समक्ष परस्तुत कर रहा हूँ!है तो काफी पुराना पर गुलज़ार साहब का लिखा,किशोर दा और मुकेश जी का गाया ये गीत आज भी एकदम ताज़ा सा महसूस होता है!'मेरे अपने' फिल्म का ये गीत आपके
 
kunwarji's
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नारी है अत्याचारी........(हास्य-वयंग्य)

कल ही महिला आरक्षण बिल पारित हुआ और आज मेरे पास ये सन्देश कई बार कई लोगो ने भेजा!मुझे लगा आपको भी ये बताना चाहिए...let,s celebrate men,s day...बेचारा मर्द.....अगर औरत पर हाथ उठाए तो ज़ालिम,अगर पिट जाए तो
 
kunwarji's
Mar 10 2010 07:08 PM
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धर्म या जाति....!(कविता)

आज समाज धर्म या जाति के भंवर में ऐसा फंसा हुआ है कि उचित-अनुचित की सुध-बुध ही खो सी गयी है!धर्मान्तरण पर तो चर्चा खूब जोर-शोर से होती है लेकिन इस पर गौर नहीं किया जाता के ये हो ही क्यों रहा है!यदि हम देखे तो जो हिन्दू बहुत गरीब या अनपढ़ है वो ही धर्म
 
kunwarji's
टैग: dharm ya jaati.
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गीता-ज्ञान यदि दुर्योधन को मिलता तो....?

जब हम प्रत्यक्ष किसी से कुछ पूछने में असमर्थ होते है तो अप्रत्यक्ष पूछ लेना चाहिए!ऐसा मुझे कई बार महसूस हो चुका है!ऐसा ही कुछ आजकल फिर मुझे लग रहा है!एक प्रशन मेरे मन-मस्तिष्क में खूब कुलाचे भर रहा है आजकल!मेरा नहीं है,पर मुझे बेचैन कर रहा है!मेरी
 
kunwarji's
Mar 05 2010 06:45 PM
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अभी मै गिरा कहाँ हूँ...(कविता)

अभी मै गिरा कहाँ हूँ,बस गिरने वाला हूँ,,,,,,,,,,,अभी तो ना दुत्कारो मुझे,उपेक्षित भी ना करो,  पास आने दो मुझे और मेरे पास आते भी ना डरो,अभी तो निर्दोष हूँ,सच्चे-झूठे दोष भी ना धरो,अच्छा-बुरा सोच कर अब भी डरता हूँ मै,पाप के डर से ही कई पुण्य भी तो
 
kunwarji's
Mar 04 2010 05:11 PM
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एक और गीत.....धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो(नवरंग)

नवरंग फिल्म का नाम तो आपने सुना ही होगा!मेरी पसंदीदा फिल्मो में से एक ये भी है!इसका संगीत कालजयी है!हर एक गीत अपने आप में एक मिसाल है सर्वश्रेष्ठ लेखन-संगीत और गायकी का!होली के आस-पास दूरदर्शन और आकाशवाणी पर इसका गीत ना आये तो होली भी झूठी सी जान पड़ती
 
kunwarji's
Mar 03 2010 08:30 AM
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ज़िन्दगी है क्या बोलो ज़िन्दगी है क्या ?

आज आपके समक्ष एक गाना प्रस्तुत कर रहा हूँ!फिल्म का नाम है "सत्यकाम"!मुझे बहुत अच्छा लगता है ये गाना!किशोर कुमार,महेंदर कपूर और मुकेश का संगम बहुत ही मन-भावन होगा ये बताने की जरुरत मै महसूस नहीं कर रहा हूँ!सुनने के लिए u-tube का लिंक नीचे दे दिया गया
 
kunwarji's
Feb 25 2010 03:30 PM
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अब मै क्या बताऊँ...........(कविता)

किसी को ना बताऊँ तो कहाँ जाऊं मै!भगवान् ने भी जो ना सुनी वो किसको सुनाऊँ मै!जो हो गया सो तो हो लिया,कुछ पा लिया कुछ कुछ खो दिया,एक दुख़ और माला में पिरो लिया,एक पल और आंसुओ से भिगो दिया;जिन्दा होने का वहम भी हो तो मर जाऊं मै!ओरो को तो बहला दू खुद को क्या
 
kunwarji's
Feb 24 2010 01:18 PM
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शादी से पहले बातचीत .......?

यह विषय आज के समय को देखते हुए बड़ा जरुरी-सा विषय बनता जा रहा है!हालांकि इसकी आवशयकता है भी या नहीं ये परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है,मेरे हिसाब से तो!इसका एक कारण बताया जाता है कि लड़की ओर लड़के की आपस में जानकारी बढ़ेगी और वो एक दुसरे को और
 
kunwarji's
Feb 20 2010 12:38 PM
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अजीब दास्ताँ है ये.......(2 )(हास्य-वयंग्य)

सर्वप्रथम तो आप सब का मुझे झेलते रहने का आभार प्रकट करना चाहुंगा!जिन्होंने मुझे "टिप्पणी ब्रांड" उत्साहवर्धक टोनिक की दो बूँद दी है,उन्हें मै बताना चाहूँगा के उनका ये प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा!हर एक बूँद मेरे लहू में मिल जो रासायनिक क्रिया कर रही
 
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Feb 19 2010 05:28 PM
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अजीब दास्ताँ है ये...(हास्य-वयंग्य)

राम राम जी!जीवन भी कई बार अजीब परिस्थितियों से दो-चार करवा देता है!और हर किसी को!मुझे तो ऐसा ही लगता है!अब कुंवर जी को ही लो,फंस गए बेचारे ऐसी ही परिस्थिति में!मजे कि बात ये कि अपने ही घर में!पौह का महीना हो तो बताने कि
 
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Feb 13 2010 03:24 PM
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डॉक्टर साहब(हास्य-वयंग्य)

बात उन दिनों की है जब कुंवर जी अपना 3 वर्षीय अभियांत्रिकी का उपाधि-पत्र  प्राप्त करने के पश्चात भी गाँव में ही समय व्यतीत कर रहे थे!कुछ दिन नौकरी भी कर ली थी,छूट गयी थी किन्ही कारणों से!तब तक स्नातक भी हो चुके थे
 
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Feb 10 2010 06:30 PM
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नुक्सान ठा  रहया सूँ मै तेरे तै ना कहवण का!फेर बेरया ना यो बखत रहवण का ना रहवण का!बोल कै बता दिया तो ख़तम कहाणी हो ज्यागी,इब तो तू अपणी सै फेर  चीज बीराणी हो ज्यागी, तू
 
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जारी है संघर्ष मेरा मुझको "मैं" बताने का...(कविता)

सितम्बर-06 ,तिथि सम्भवतः 29   या 30 ! दिन के १२ बजे के लघभग का समय!कुंवर जी कक्ष में शान्त,अकेले ओर गहन चिन्तन में!अधिकतर ऐसी स्थिति बहुत कम ही आती है जिनमे कुंवर जी इन तीनो के संग दिखाई दे!बात ही ऐसी हो गयी थी थोड़ी देर
 
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दुःख...(वयंग्य)

मित्र!एक ऐसा शब्द है जो पूर्णता देता है हमे!या यूं कहिये कि सम्पूर्णता देता है हमे,यदि 'मित्र' शब्दों से बहार है तो!मै आज थोडा सा गंभीर सा हो गया हूँ,अपने एक मित्र को  धोखा देते हूए देख कर!अभी एक फिल्म देखी थी '३ idiots'!उसमे अभिनेता
 
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शाम कि सैर...(हास्य-वयंग्य)

दो विद्वान पुरुष शाम की  सैर पर निकल पड़े!विद्वान् इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वो दोनों कुछ देर बाद ही पूरी मानवजाति के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने वाले थो जो आज कि मानव-मानसिकता पर एक-दम फिट बैठता है!संध्या समय,सूरज दिन-भर कि थकान
 
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मिट्टी मेरी....(एक कविता)

किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता हूँ,पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!जो मुझे जैसा समझता है मै वैसा ही हूँ मै,जो खुद को जैसा भी समझता है वैसा भी हूँ मै,पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!ऐसे तो हाड़-मांस कि ही हूँ
 
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आज तो हँस ही लो..........

बधाई हो,आज २६ जनवरी है न इसीलिए!और मै हमारे गाँव में शिव जी के निकलने की बधाई थोड़े ही दे रहा हूँ!आपको तो पता ही होगा खैर,मुझे थोडा देर से पता चला था!असल में आज छुट्टी थी तो थोडा और सो लिए थे,जब तक जागे परेड हो चुकी थी!वैसे भी लालकिले
 
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Jan 27 2010 12:19 PM
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जारी है संघर्ष मेरा मुझ को "मै" बताने का.........

जब भी मै नहीं लिख रहा होता हूँ तो  मै ये सोचता रहता हूँ कि आज उस विषय पर लिखूंगा-आज उस विषय पर लिखूंगा !परन्तु जैसे ही मै लिखने बैठता हूँ मस्तिष्क एकदम सुन्न जैसे,विचारो के नाम पर केवल रिक्तस्थान!कुछ भी तो सूझता नहीं जिसपर मै कुछ भी लिख पाऊं !
 
kunwarji's
Jan 21 2010 05:47 PM
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kunwarji's

सर्वप्रथम तो सभी को हाथ जोड़ कर प्रणाम !ब्लॉग्गिंग में मेरा ये पहला अनुभव है,मुझे नहीं पता के इसके क्या-क्या सदुपयोग और क्या-क्या दुरूपयोग हो सकते है!मै अभी तो इसका प्रयोग केवल एक आलोकपुस्तिका कि तरह ही करूँगा जिसको कोई भी पढ़ ले और मै ये चेष्टा भी सदैव
 
kunwarji's
Jan 13 2010 11:59 AM