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18 Jun 2010
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ऐसे नचनियाये, पिल्‍लाये समय में..

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित,
 
Pramod Singh
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आसान नहीं होता, होना.. लेखक..

तुम्हारे लिए तो पैरिस ‘अ मूवेबल फीस्ट’ नहीं होगा, फिर फटेहाल क्यों घूमते होगे, ढूंढ़ते क्या लंदन में, लेखक? सैंतालीस साल के संक्षिप्त जीवन में जीवन से कैसा जी लगाया होगा, भाषा को सर के बल खड़ा करके बस इतनी ज़रा उम्र, अपनों की ही नहीं, स्पेन के सपनों की
 
Pramod Singh
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तस्‍वीर बनाता हूं..

मगर बनती कहां है? कुछ भले, भोले लोग एक घर खड़ा करने की कोशिश करते हैं, पता चलता है कुछ समय बाद उन्‍हें बेदखल कर वह जगह इतिहास ने घर कर लिया है. ऊपर की तस्‍वीर बीसवीं सदी के शुरुआत में रमल्‍ला के एक किसान परिवार की है, यहां वीकीपीडिया से उठकर आई है..
 
Pramod Singh
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सारंगा तेरी याद में..

हंसी-मज़ाक की बतकही देखते-देखते तीखे झगड़े में बदल गई थी. ऑडिसियस (किताब उसी के हाथ में थी) ऊपर हवा में किताब लहराता भावुक होकर चीख रहा था, ‘आप भूलिए मत, अदम ग़ुलाम नहीं थे! उनकी तबियत हुई, चीन गए. लोकतंत्र व्‍यक्ति के विचार को ही नहीं, उसकी भौतिक गति का
 
Pramod Singh
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इतना देखो कि आंखें जलने लगें..

"ऊब के रेगिस्‍तान में वीभत्‍स एक नख़लिस्‍तान" - बाबू बॉदेलेयर"Cervantes, who wasn't dyslexic but who was left crippled by the exercise of arms, knew perfectly well what he was saying. Literature is a dangerous occupation."यह एक दूसरे बाबू ने कहा. था. और
 
Pramod Singh
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जैसा जीवन है..

शायद अपने यहां बहुत सारी कला जीने का मतलब बहुत सारे दु:ख जीने की तैयारी को न्‍यौता देना होता हो? जैसे मोबाइल फ़ोन के टावरों को सिर पर सजाते रहने की सुखनसाज कलावंती में रेडियेशन के हौज में बूड़ जाने की होशियारी बनती जाती हो.. पता नहीं किस तरह का शासन है
 
Pramod Singh
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आता है प्‍यार

दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्‍हें हंसता देखा था स्‍टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था सपने में दीखी हों नीली पहाड़ि‍यां, उसकी घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था. सपनों के ज़रा, एकदम
 
Pramod Singh
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माने, जाने जिनकी सहूलियत के लिए गिना जाता होगा, देश..

इतनी हड़बड़ी में मां को समझाना मुश्‍कि‍ल था कि गड़बड़ी होनी नहीं चाहिए. हड़बड़ी न होती तब भी मां को समझाना मुश्किल होता. गड़बड़ी हुई मतलब गई चीज़ें हाथ से. जैसाकि देवराज चाचा पूरे आत्‍मविश्‍वास से कहा करते थे. ‘इट इज़ लाइक ड्राइविंग ऑन द हाइवे’, चाचा
 
Pramod Singh
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होऊंगा जहां नहीं दीखूंगा

घबराहट के किसी क्षण घेराई मेंहदबद की खोजाई, ज़ि‍रह की लड़ाईमें खुद को खोजने निकलूंगा, कभीनिकला करते थे जैसे कॉर्टोग्राफ़रमापने पहाड़, पानी की चौड़ाईचार दिन और तीन रातों के सफ़रके बाद दीखेगा कोई सूखा मैदाननिर्जन अनजान, झमेले दारु के अड्डेपर कई सारे सिर
 
Pramod Singh
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कहां-कहां गुज़र गया..

शंघाई में अमरीका, शिकागो में चीनी..
 
Pramod Singh
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वागानोव की व्‍यथा और अन्‍य किस्‍से..

कुछ लोग अपनी किस्‍मत में जाने कैसे हीरे की हंसी और पत्‍थर के आंसू लिए आते हैं, कि पत्‍थरदिल दुश्‍वारियों में हो सकता है आंखों में एक गहरी उदासी घर जाये, मिजाज का सेंस ऑफ़ ह्यूमर कभी बेदम नहीं होता. बहुत वर्ष हुए विश्‍वविद्यालयी दिनों में करीबन डेढ़ सौ
 
Pramod Singh
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नौका डूबी पर सवार..

रह-रहकर पानी में चप्‍पू खेने की आवाज़ आती. इससे अलग एकदम सन्‍नाटा था. और अंधेरा. रात भर की थकान के बाद तीन दिन पहले लड़का जब पहली मर्तबा सुबह के उजाले में नाव पर चढ़ा था तब उसकी खुशी का पारावार न था. जाने कहां-कहां के लोगों और उनके अजनबी पहरावों और
 
Pramod Singh
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मैजेस्टिक ह्यूमन कॉमदी की कहानी

मैं जुसेप्‍पे को घेरना चाहता था, या मालूम नहीं खुद को सिर के बल खड़ा करके एक ऐसी चीज़ समझने की कोशिश कर रहा था जिस कहन के समझने के दिन अब बीती-बिसरायी हुई, क्‍योंकि सचमुच अब कौन पढ़ता है उपन्‍यास? किताब की दुकानों में और कुछ खुशहाल घरों की अलमारियों में
 
Pramod Singh
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बच्‍चे की कहानी

देर रात जब झिंगुर अपना हल्‍ला मचा-मचाकर थक गए होते, और सब तरफ़ सन्‍नाटा छा जाने के बाद जब जागी आंखों के सपने में कहीं दूर से उठी चली आती मेले की आवाज़ें आत्‍मा में गड्ढे गोड़ना शुरु करतीं, मैं चिंहुककर और जल्‍दी-जल्‍दी अम्‍मां के पैर दबाने लगता. अम्‍मां
 
Pramod Singh
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कहानी की कहानी

“उनींदे के दरवाजे़ सपने के सुरंग में उतरते ही मुसाफिर को ख़याल हुआ वह ग़लत ठिकाने चला आया है, उसने खूब हाथ-पैर पटकने शुरु किये, मगर कहानी में एक मर्तबा कूद पड़ने के बाद अब क्‍या हो सकता था, भोला मुसाफिर लचीले तारों की महीन, नशीली दुश्‍वारियों में और-और
 
Pramod Singh
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दौड़ती, अटकती, कहानी

घोड़ा रास्‍ता भूल गया होगा, एक सरपट तेज़ी से दौड़ता, कुछ आगे जाकर बार-बार अचकचाकर फिर खड़ा रह जाता होगा, ताज़्ज़ुब और तक़लीफ़ में जबड़े चबाता, अपने सोचने को सिलसिले में दुरुस्‍त करने की कोशिश करता, कि ग़लती कहां हो रही है, कि मन में यह किसने रास खींची
 
Pramod Singh
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पुराने गाने का नया पाठ

मतलब वही, नये बोतल में पुरानी शराब, यही होगा न? कि सरल और निर्दोष से दीखते इस वाक्‍य में कहीं इससे भी ज्‍यादा गूढ़ार्थ घुसे हुए हैं? ठीक है, आपकी बला से घुसे रहें, यह कोई डिकंस्‍ट्रक्शनिस्‍ट सेशन नहीं है, और न आपमें से कोई उम्‍बेर्तो एको का चेला है,
 
Pramod Singh
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चिंताजनक प्रश्‍न है हंसते-खेलते सब तक पहुंचने वाले दु:स्‍वप्‍न अभी तक ऐसा क्‍यों है कुछ लफंगों की पहुंच में नहीं आ रहे?..

पता नहीं कुछ कैसे अभागे लोग हैं दुनिया कहीं से कहीं पहुंच जाएगी मगर ऐसे चिरकुटों की हाय-हाय का असहायगान बंद नहीं होगा कि भाई साहब, भाई साहब, सुना बिलासपुर तक में आ रहे हैं, फिर ऐसा कैसे है कि हमारी तरफ आने में अभी भी अवरोध बना हुआ है? मतलब कुछ करिये,
 
Pramod Singh
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दुनियाभर के पगलेटों के लिए सरवांतेस का सपना..

कुछ वज़ह होती होगी कि क्‍यों दुनिया के एक से एक तोपख़ां और उनके युगीन ‘युगांतरकारी’ कारनामे बिला जाते हैं, और कैसे प्रकट रूप से मामूली दिखनेवाली, अवसादी समय में एक पगलेटी सनक का आख्‍यान, सत्रहवीं सदी के शुरुआत में लिखी गई, अभी भी जीवन्‍त और मार्मिक अर्थ
 
Pramod Singh
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अचक्‍के

रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब जाया होता दीखूंगा, अपने शरम में मुंह चुराता, इस गली उस सड़क यूं ही आता-जाता फिर देखोगे एक दिन अचक्‍के में ही मिलूंगा कभी जैसे खुद को भी तुम पाओगे ऐसे ही कभी गोपन क्षणों अप्रत्‍याशित, अचकचाये हुए धीमे स्‍वयं के करीब आते, दुलराते
 
Pramod Singh
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तुम संग सिर अझुरा के मैं हार गई, सजना.. मतलब ऐ मेरे व्‍हॉटेवर..

द स्‍टोरी ऑफ़ अ हेयरी गर्ल: भाग दो लड़की छोटी थी तब बीच में रहते-रहते मां की चिंहुक सुना करती, ‘दुनिया में एक से एक छिंकाल पड़ी हैं, मेरे कोख से ही, मुई, इन बालों को बाहर आना था?’ लड़की सुनती और भृकुटि ऊपर चढ़ाये खिन्‍नमना भीतर ही भीतर ख़ून पीती चुप पटाई
 
Pramod Singh
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लड़की के बाल की खाल..

लड़की पता नहीं किस देश की थी, हालांकि वह दावे से हाथ झटकती बताती फिरती कि वह जानती है किस देश की है और इस बारे में किसी तरह की ग़लतफ़हमी बनाने की ज़रूरत नहीं, मगर उसके साथ यह भी उतना ही सही है कि उसके बालों का जिक्र छिड़ते ही लड़की का चेहरा भक्‍क सफ़ेद
 
Pramod Singh
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घास पर गिरी लड़की, रेल में गिरा..

हरी घास पर धम्‍म् गिरी लड़की को हरा घास नहीं काली पथरीली ज़मीन का सियाह अंधेरा दिखेगा तिस पर सर पटक ले पागल हो जाये क्‍या करे इतने सवाल हैं माथे में किसी का जवाब सूझता नहीं ऐसा नहीं है कि समांतर सिनेमा की शबाना है, सुखी नहीं है मुस्‍कराते में कई तस्‍वीरे
 
Pramod Singh
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बिना शीर्षक..

‘कुछ तो होता होगा जो दिखता नहीं, मगर लौकी के बतिया को रोज़ कुछ बड़ा करता चलता है, नहीं?’ मौसा दन्‍न देना बोलते, बबुनी के बालों में हल्‍के हाथ फिराते हुए, फिर एकदम हंसने लगते. बबुनी चौंककर उनका चेहरा देखती, फिर खपड़े की लौकी पर, और आसपास, कि कहां जादू हुआ
 
Pramod Singh
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आंग्‍स्‍ट..

पता नहीं यह आंग्‍स्‍ट मुझे कहां ले जाएगी. जबकि आईपीएल से मेरा कुछ लेना भी नहीं. न पूर्णा पटेल या सुप्रिया सुले से है. लेना. वो चाहें भले मुझे कुछ दे दें, मुझे उनको नहीं देना. एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) तक से मेरे गुप्‍त या प्रकट किसी तरह के संबंध
 
Pramod Singh
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मन की बात..

रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्‍न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये के कंगलई में कुबेर. बरसाती नाला-सा भहर बहा आता है, बेहयायी हंसी-बसी पुलकदायी खुशी में समूचा ढेर, मुलतानी पठान, विज्ञापन फ़ि‍ल्‍मों का बबर शेर हो जाता
 
Pramod Singh
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हाय रे हाय, दुपहरिया नींद नै आय..

का करे अमदी, सिर फोर ले? मगर सिर तS फुटले है, मतलब खांचावाला ऊ कपार, जेकरा बीच बाबू किस्‍मतकुमार अपना सेटिंग लिये हैं, ऊ किस्‍मत-कसार तS फुटलके हाथ भेंटाइल है, फिर सिर फोरे का अरमान में कवन नवका ऐलीमेंट ठेल रहे हैं? पुरनके सेंटीमेंटल नै बोल रहे हैं? मगर
 
Pramod Singh
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इस एकदम ज़रा देर के लिए में जितना जीवन होगा..

एक‍दम ज़रा देर के लिए होगा, बस ज़रा ज़रा देर के लिए कि जिजीविषा भरी वह आवाज़ धौंकती आएगी, बगल से गुज़र जाएगी, इक सिसकारी छाती पर भारी, लिपटे लपेटे जैसे आग और धुएं के धुंध में दगे गुज़रते थे वो गुज़रे ज़मानों के इंजन, धक् कलेजा मुंह को आता था और माथे के
 
Pramod Singh
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नक्‍सलवाद का जवाब है हमारे पास?

ऐसे में यह मज़ेदार है जब घेरे में फंसे दोनों पालों का देवों और दानवों में स्‍थूल विभाजन करके, देवों का पाला थामे दानवों के चिथड़े उड़ाये जा रहे हों, एक बुजुर्ग गांधीवादी ऐसी सन्-सन् फिजा में भी तटस्‍थता की चंद समझदार बातें करते दीखें. आप भी भरी हुई बंदूक
 
Pramod Singh
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बच्‍ची और मैं और धू-धू जलता दिन..

बच्‍ची फिर आकर अपने पोज़ीशन पर खड़ी हो गई है और आंखें फाड़े मुझे घूर रही है! अरे, इसे कोई रोकेगा नहीं? शरीफ़ों के मुहल्‍ले में ये क्‍या तमाशा है! (ठीक है कि मुहल्‍ले में मैं भी रहता हूं, मगर मुहल्‍ला शरीफ़ ही है. बच्‍ची के घरवाले तक शरीफ़ लोग हैं. बच्‍ची
 
Pramod Singh
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हिंदी का कवि होगा..

बड़ा भेड़ होगा हिंदी का कवि होगालहकेगा, तीन पत्‍ते की डाल के पीछेबहकेगा, जाने कौन नैतिकता की रासहोगी (रास माने रस्‍सी) कि भाषा की खासनाद से बंधे होंगे, उसी में फुत्‍कारेंगे, दुमझारेंगे, जैसे रेलवे की रिर्जव सीट है उससेहट नहीं सकते, किसी भी सूरत में वाक़ई
 
Pramod Singh
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फिर हुआ..

फिर हुआ हम अपनाइयों में घिरेकिरकिरायी कितनीं, टूटे कांच के टुकड़े, किरकिराती थकाती, बनाती रहीं ग़लतफ़हमियां, ज़ाहिर है होना थाआख़ि‍र आदमी की जात हैं, हुआहम चौंके चौंकते रहे, मगर सच्‍चा डरे, बहुत आसानी से बड़ी रवानी में सीधे एकदम साफ़-साफ़ गिरे.
 
Pramod Singh
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मतलब क्‍या है फिर देखने का, सुनने का?

कुछ बिम्‍ब, कोई स्‍वर अंदर अवचेतन में कहीं गड़ा रह जाता है, क्‍यों गड़ा रह जाता है? जैसे यही फ़ि‍ल्‍म के अंत का यह बैकग्राउंड स्‍कोर की सीधी सरल पुकार, मगर कैसी गहरी मार.. कहां से सरलता में चला आता और फिर किस अमूर्तन में छोड़े जाता, क्‍यों?
 
Pramod Singh
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काम न करने की एक बेमतलबी का चित्र..

फ़ोन पर आदमी खुद से बात कर रहा है, कैसे करें बताओ? फ़र्श पर तीन साल की बच्‍ची बुक्‍का फाड़े रो रही है, मानो आज रुदन-दिवस हो और वह पहले पुरस्‍कार की कैंडीडेसी का अपना केस बना रही हो. आदमी पहले बरजियाये, फिर रिरियाये इशारों से बच्‍ची को देखता है, कि ज़रा
 
Pramod Singh
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दु:स्‍साहसी दिबाकर बहादुर!

फ़ि‍ल्‍म देखे अब कुछ चौबीस घंटों से ज्‍यादा हुआ, उस देखे पर कुछ लिखना चाह रहा था, मगर दिमाग में जो बेचैनी तनी है, उसका वाजिब संगठन नहीं हो पा रहा, लगता है जो भी लिखूंगा, वह अधूरा, अपर्याप्‍त होगा, 'नये' सिनेमा की बुनाई का जो एक 'डिज़ाइन' दिबाकर ने 'ओय
 
Pramod Singh
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धुलियाये लैंडस्‍केप में..

जाने कैसी आवारा गोधुलि बेला है, खुले उजाड़ मैदान के एक छोर टहलते हुए लगता है मानो ग़लत पते पर आ गए हों. जैसे मैदानी नाटकीय फैलाव के किसी कोने रेज़्ड प्‍लेटफ़ॉर्म पर कोई तेलुगू बाई का राजस्‍थानी नाच हो सकता था, या प्रतापगढ़ की किसी बिसराई नौटंकी का रिपीट
 
Pramod Singh
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क्‍या होगा गरमी का असर होगा?

बहुत गर्मी झेलते रहने के बाद अभी झेलने को और गर्मी रहेगी. जैसे काफी कुछ पढ़ते रहने के बाद भी काफी कुछ पढ़ने को बचा, मुंह बिराता अपने में निस्‍संग बुदबुदाता दिखेगा. आलिफ़ बे से छूटे हुए फ़ैलन की डिक्‍शनरी लजाती और शास्‍त्रीयता से बाज आये बाबू हमें आलोक
 
Pramod Singh
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दायें या बायें..

जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है..
 
Pramod Singh
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संध्‍याराग के बाद अब मैं क्‍या गाऊं, नहीं, मम्‍मा, तुम बताओ!

टैरेस पर इतने लोगों को देखकर सोहा घबरा गई. ज्‍यादातर अनजाने चेहरे. पहली बात दिमाग में यही आई कि चुपचाप उल्‍टे पैर वापस लौट जाए. (उसी पल दिमाग में ब्‍लौंडी का बैलून भी पॉप-अप हुआ, ‘हां, लौट आओ वापस और आकर मेरा जीना हराम करो, राइट?’ ब्‍लौंडी का तकिया-कलाम
 
Pramod Singh
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एक रुसी गाना..

एलेन क्लिमोव की 1965 की फ़ि‍ल्‍म का गाना है, नोवेल्‍ला मात्‍वेयेवा का लिखा और गाया, फ़ि‍ल्‍म देखते हुए उत्‍साहित हो रहा था, उसी उत्‍साह को यहां चेंप रहा हूं..
 
Pramod Singh