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17 Jun 2010
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मैं हूँ तो

मैं एक संभावना हूँ मुझसे सुर निकल सकते हैंमैं आग बन सकती हूँमैं शीतल बयारमैं सुबह का अजानमैं कुरआनमैं शंखनादमैं उम्मीद की किरणमैं विश्वास का दीयामैं उठती लहरें महत्वाकांक्षाओं की उड़ानमंजिल आकाशधरतीवृक्षपक्षी अदृश्य की उज्जवल खोज ....तुम मुझे कुछ भी बना
 
रश्मि प्रभा...
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सांप और इन्सान

हरा सांप नहीं काटता काटना उसकी प्रवृति नहीं तो सारे डरपोक !उसकी पूँछ पकड़ हवा में घुमाते हैंऔर दूर फ़ेंक देते हैं सांप...कोई प्रतिरोध नहीं करता आगे बढ़ जाता हैतो सारे डरपोक !ताली बजाते उस पर पत्थर फेंकते हैंसांप अधमरा लहुलुहान...बुजुर्गों को कहते सुना है
 
रश्मि प्रभा...
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क्लिक !

बड़े गंदे हो चले थे शब्दकरीने से सजाना मुश्किल हो चला था बच्चों की तरह धूल में सनकरशरारत से हँस रहे थे ...मैंने भी अच्छी माँ की भूमिका निभाईटब में पानी लिया जॉनसंस शैम्पू डाला और शब्दों को उड़ेल दिया ब्रश से रगड़ामुलायम तौलिये से सुखाया पाउडर लगायाआँखों
 
रश्मि प्रभा...
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फिर भी...

क्यूँ हो रहा है ऐसामेरी मुस्कुराहट हल्की हो गई है ख्वाब कुछ संजीदा से हो गए हैंआँखों में अकेलेपन की नदी बहने लगी है...यूँ मैंने प्यार की पाल खोल दी हैतूफ़ान का शोर ना हो व्यवधान न हो !और तो औरदुआओं का धागा भी अदृश्य को बाँधा हैफिर भी...फिर भी ख्वाब कुछ
 
रश्मि प्रभा...
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कोयल

सुबह आँख खुलतेसुनती हूँ कोयल की कूकमुझे कोई अपना याद नहीं आतामैं तो बस कोयल की मिठास और उसके बदलते अंदाज में खो जाती हूँकोयल गाती हैफिर जोर से बोलती हैमैं उसकी हर अभिव्यक्ति को सुनती हूँएक गीत, एक पुकार, एक झल्लाहट ..क्या नहीं होता उसके तेवर में !कहती है
 
रश्मि प्रभा...
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अगले जनम .....

गरीबी !नन्हीं-नन्हीं खुशियाँनन्हें-नन्हें ख्वाब..पैसे के लिए बेटी को बेचनासपनों को मिट्टी में मिलाना बड़े ठाकुर की शतरंज का प्यादा बनानापूरी सांसें दूसरों की धरोहर ...!फिर भी कहना 'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो'-- क्यूँ?कितने जन्म?कितने जनम सज़ाएआफ़्ता
 
रश्मि प्रभा...
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तुम कहाँ हो

एक बादल आकर रुका हैकुछ नम सी हवाओं ने छुआ हैतुम कहाँ होबूंदें बरसने को हैं मन सोंधा हो उठा है चेहरे के इन्द्रधनुषी रंगआँखों से टपकने लगे हैंकोई देख ले उससे पहले आ जाओफिर जमके बारिश होहवाएँ चलेंबिजली चमके बादल गरजे तुम्हारे साथ मैं धुली धुली पत्तियों सी
 
रश्मि प्रभा...
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भय और सच

सुबह आँखें मलते सूरज को देखते मैं सच को टटोलती हूँये मैं , मेरे बच्चे और मेरी ज़िन्दगी फिर एक लम्बी सांस लेती हूँसारे सच अपनी जगह हैं अविश्वास नहींएक अनजाना भय कहो इसे हाँ भयउन्हीं आँधियों का जिसने मेरा घरौंदा ही नहीं तोड़ामुझे तिनके-तिनके में बिखराया
 
रश्मि प्रभा...
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लौटो , लौट आओ

कुछ कदम पीछे लौटोआगे विनाश है सब ख़त्म होनेवाला है...पीछे मुड़ोकिसी हल्की सी बात परघंटों हंसोतनी नसों को आराम दोलौटो , लौट आओदोष किसी और का नहीं संभवतः दोष तुम्हारा भी नहींदोष ' और ' की चाह प्रतिस्पर्धा की दौड़ की हैक्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?अभी भी
 
रश्मि प्रभा...
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इन्हें आता है

यह तो होना था ...मैं नहीं रही !मेरी आँखों , मेरे स्वर मेरे स्पर्श की गर्माहट से सुरक्षित मेरे बच्चे शून्य में हैं !यूँ समझा दिया था सब -'जब भी यह दिन आए अपना हौसला मत खोना जैसे अब तक मेरे पास अपनी बात रखते आए होतब भी रखना - जब मैं ना रहूँयकीन रखनामैं सब
 
रश्मि प्रभा...
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इस बार नज़र नहीं लगने दूंगी !

कितनी छोटी सी लड़ाई थी पर हमारे चेहरे गुब्बारे हो गए थे- महीनों के लिए !जिद उस उम्र कीइगो का प्रश्न थाहार कौन माने !पर उम्र का ही तकाजा था या फिर ख़्वाबों का ...हम हारे तो साथ साथ !जाने कब इस हार की रुनझुन नेकानों में धीरे से कहा - 'इसे प्यार कहते
 
रश्मि प्रभा...
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उसके लिए ...

मिट्टी के चूल्हे पर शर्मीली आँखों का तवा रखख़्वाबों की रोटियाँ सेंक ली हैलरज़ते ख्यालों की सब्जी मेंप्यार का तड़का लगाया हैउसके आने की खुशबूहवाओं में फैली हैइंतज़ार की अवधि को जायकेदार नमक के साथकुरमुरा बनाया हैमनुहार की चाशनी उसे रोक ही लेगी ...
 
रश्मि प्रभा...
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कायनात का जादू बाकी है

इनदिनों शब्द मुझसे खेल रहे हैं मैं पन्नों पर उकेरती हूँ वे उड़ जाते हैं तुम्हारे पास ध्यानावस्थित तुम्हारी आँखों को छूकरकहते हैं - आँखें खोलो हमें पढ़ो ....मैं दौड़ दौडकर थक गई हूँ समझाया है -तंग नहीं करते पर ये शब्द !जो कल तक समझदारी की बातें करते थेआज
 
रश्मि प्रभा...
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समर्पण !

समर्पण .... कैसा? किसको?समर्पण का आधार कभी भी शरीर नहीं होताशरीर ! तो कोई भी पा लेता है आत्मा !- अमर हैसमर्पण का स्रोत है गंगा वहाँ से निकलती है ...गंगा में नहाना और गंगा को समझना - दो अलग बातें हैं ...गंगा में नहाकर ना तुम पवित्र होते होना गंगा मैली
 
रश्मि प्रभा...
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दर्द का सत्य

अगर तुम दर्द के रास्तों को नहीं पहचानतेतो ज़िन्दगी तुमसे मिलेगी ही नहीं दर्द के हाईवे से ही ज़िन्दगी तक पहुंचा जाता है ..रास्ते में सत्य का टोल नहीं दिया तो आगे बढ़ना मुमकिन नहींजिन क़दमों को तुम आगे बढ़ जाना समझते हो वह तो फिसलन है कोई सुकून नहीं वहाँ
 
रश्मि प्रभा...
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ऐसा क्यूँ?

कई लोग के ब्लॉग खुलते नहीं, जब भी खोलती हूँ warning आता है, जिसमें फिलहाल राज भाटिया जी, वंदना जी(आज ऐसा शुरू हुआ) और कुछ और परिचित ब्लॉग हैं...ऐसा क्यूँ?
 
रश्मि प्रभा...
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सुवासित वक़्त

पतझड़ में गिरे शब्द फिर से उग आए हैं पूरे दरख़्त भर जायेंगेफिर मैं लिखूंगी पतझड़ और बसंत शब्दों के तो आते-जाते ही रहते हैंजब सबकुछ वीरान होता हैतो सोच भी वीरान हो जाती हैसिसकियों के बीच बहते आंसुओं सेकोंपले कब फूट पड़ती हैंपता भी नहीं चलतामन की दरख्तों
 
रश्मि प्रभा...
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अनंत विस्तार

तेरी आँखों के सोनताल मेंनज़्मों का उबटन लगामैं नहाती हूँशब्दों का मनमोहक परिधानमुझे तुम्हारी नज़्म में ज़िन्दगी देता हैइस आबेहयात का रंग मुझे अनंत विस्तार देता है
 
रश्मि प्रभा...
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गर्मी है !!!

उफ़ ये गर्मी !शब्द भी बीमार हो गए हैं डिहाईडरेशन के शिकार हो गए हैं सर उठाते तो हैंपर निढाल लुढ़क जाते हैं ...एलेक्ट्रोल पिलाया हाई दही सफगोल भी दिया हाईनिम्बू पानी तो भरपूर फिर भी आँखें थोड़ी खुली थोड़ी बन्द सी हैं शब्दों की तीमारदारी ज़रूरी है वरना
 
रश्मि प्रभा...
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तूफ़ान और ख़ामोशी

तूफ़ान और ख़ामोशी मिलते हैंकिसी जिद्दी बच्चे की मानिंद तूफ़ान सर पटकता है सारी चीजें इधर से उधर कर देता हैपेड़ की शाखाओं को हिलाता है चिड़िया डरके घोंसले में दुबक जाती है बरसनेवाले मेघ भी बादलों में दुबकेउड़ जाते हैं ..पर ख़ामोशी !एक माँ की तरह तूफ़ान का
 
रश्मि प्रभा...
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गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में

हम तो हमेशा तलवार की धार परसाथ चलेजब मैं कटी तो तुम भी लहुलुहान थेमैंने तुम्हें पट्टी बाँधीतुमने मुझे और प्यार के इस मरहम सेमुस्कुराने लगेजब मेरे सामान फेंके गए उसमें तुम्हारे नन्हें खिलौने भी थेमैंने तेजी से तुम्हारे खिलौने उठायेआँचल से पोछ बक्से में रख
 
रश्मि प्रभा...
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अपनी मर्जी की नहीं

आम घरों में बेटियाँ साल भर में बड़ी हो जाती हैं और निरंतर बड़ी होती जाती हैं मन की उम्र कीकोई पहचान नहीं होतीनहीं होता उसे प्यार करने का अधिकार उसकी कोई धरतीअपनी मर्जी की नहीं होती हाँ वो बनाती है ज़मीन अपनी मर्जी का अपने मन में पर वहाँ भी पैर लहुलुहान
 
रश्मि प्रभा...
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मैं कुछ नहीं !

चलते-चलते सांय-सांय सी ख़ामोशीऔर वक़्त के आईने में मैं !बहुत धुंधला नज़र आता है सबकुछ डर लगता है !जीत की ख़ुशी और अल्पना परप्रश्नों के रंग बिखरे होते हैं...आदत है सहज हो जाने कीवरना..कुछ भी तो सहज नहीं !हर कमरे में डर और शोर का अंदेशा..स्वाभाविक ज़िन्दगी
 
रश्मि प्रभा...
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दिल की बात !

मेरा दिल करता हैतुम्हें अमलतास का पेड़ बना लूँकिसी गांव की अल्हड़ बाला सी तुमको पकड़कर घूमती जाऊँ घूमती जाऊँ जब तक तुम्हारी शाखाएंमुझे थाम न लें ...
 
रश्मि प्रभा...
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अपर्णा की तलाश

ये दो नज्में इमरोज़ जी ने भेजी है...........एक अपर्णा की है, और दूसरी नज़्म अपर्णा की नज़्म के जवाब में इमरोज़ की है .अपर्णा का पता उनसे खो गया और वे यह नज़्म उसे भेज नहीं सके......यह उनका प्रयास है मेरे द्वारा उन्हें ढूँढने का......मुझे विश्वास है- यह
 
रश्मि प्रभा...
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मेरी फितरत

विपरीत लहरों पर तैरना मेरी फितरत रहीहादसों में ख़ुशी तलाशना मेरी फितरत रहीआंसुओं के मध्य आबेहयात मिलनामेरी फितरत रही तभी-ज़िन्दगी मेरे साथ है
 
रश्मि प्रभा...
Mar 04 2010 12:19 PM
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होली की शुभकामनायें

रंग प्यार का रंग आशीष कारंग हमारी भाषा कारंग हमारे देश कारंग हमारे कर्मठ जवानों का रंग हमारी आन-बान-शान का रंग हमारे संस्कारों का ....आओ हम अपनी नफरत का दहन करेंऔर इन रंगों से अपना आज रंग लें..............होली की शुभकामनायें
 
रश्मि प्रभा...
Feb 25 2010 07:47 PM
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.....!

मैं अकेली कहाँऔर कब?नज्में मेरे पास सांसें लेती हैं
 
रश्मि प्रभा...
Feb 23 2010 12:59 PM
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खाकर देखो तो

गोल-गोल रोटियों पर आज एक नज़्म लिखा हैदाल में ख़्वाबों का तड़का लगासब्जी में ख्वाहिशों का नमक मिलाया हैखाकर देखो तोज़िन्दगी क्या कहती है
 
रश्मि प्रभा...
Feb 20 2010 01:34 PM
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सुकून

ना किसी डाकिये की ज़रूरत हैना कबूतर की मेरे पंख हैं ना !उड़कर आना अपनी चोंच में दबे शब्दतुम्हारी मेज पर रखनासुकून देता हैऔर अगली लम्बी उड़ान कीप्रबल इच्छा होती है
 
रश्मि प्रभा...
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दिल का हिस्सा

मैं दिल का वह हिस्सा हूँजिससे तुम कहो ना कहोवह सुनता हैधड़कता है.....कई बार आँखें नम होती हैंपलकों पे ठहरी बूंद तुम्हारी परछाईं बन जाती है
 
रश्मि प्रभा...
Feb 14 2010 09:10 PM
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कुछ कह दो

कुछ भी पुराना नहीं कुछ भी अनजाना नहीं कुछ भी अनकहा नहींकुछ भी अनसुना नहीं फिर भी क्यूँ हैं हम अजनबी सेक्यूँ ओढ़ ली है हमनेख़ामोशी की चादरेंक्यूँ हमने अपनी-अपनी सरहदें बना ली हैंप्यार की बातें भी तो हमने ही की थीं एहसास की बातें हमने ही की थीं तो फिर
 
रश्मि प्रभा...
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ख्वाब पूरे होंगे

कहता है वोख्वाब होते ही हैं सच होने के लिएयूँ ही ख्वाब आँखों में नहीं उतरतेसुनते ही एक अदृश्य डोरमेरी पाजेब बन जाती हैरुनझुन की मिठास बनउसके आँगन मेंपूजा के दीप जलाती हैकहता है जो वह सचतो ये ख्वाब भी पूरे होंगे !
 
रश्मि प्रभा...
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इमरोज़ की कलम से इमरोज़

नज्मों की दोस्ती लम्हा-दर-लम्हा बढ़ीकुछ तुमने कहाकुछ हमने कहापलों की गतिविधियाँ बढीं ...................इन्हीं गतिविधियों के अंतर्गत इमरोज़ की कलम से इमरोज़
 
रश्मि प्रभा...
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'अनुभूतियाँ' दीपक चौरसिया 'मशाल' का काव्य-संग्रह

'अनुभूतियाँ' दीपक चौरसिया 'मशाल' का काव्य-संग्रह - अनुभूतियों के दस्तावेज़ हैं. एक-एक एहसास कदम-दर-कदम हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है - कवि का परिवेशीय व्यक्तित्व उसकी कलम की आत्मा है. जीवन के हर रंग रचनाओं में दृष्टिगत हैं ......दीपक जी की पहली
 
रश्मि प्रभा...
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मुश्किल है !

टूटते तारे ने कहा'मांगो मुझसेजो चाह लो, मिलेगा 'मैंने कहा -'तुम फिर से अपनी जगह पर आ जाओ'धरती में समाहित ताराबोला- मुश्किल है !( कहने का तात्पर्य यह कि बड़ी-बड़ी इच्छाओं को पूरी करनेवाला भी खुद के लिए असमर्थ होता है )
 
रश्मि प्रभा...
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चिठ्ठी आई है

यादों के गाँव से चिठ्ठी आई हैयाद किया है अमरुद के पेड़ ने नन्हे पैरों की चहलकदमी कोजो उसकी पतली शाखाओं पर भी मचलते थेयाद किया है गोलम्बर नेजिसके किनारे रजनीगन्धा की खुशबू हुआ करती थीअब उसके किनारे दरक चले हैंकहीं कोई खुशबू नहींयाद किया है आँगन ने जहाँ
 
रश्मि प्रभा...
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प्रत्यंचा

मन की धाराएँतटों से टकराकरजब गुमसुम सी लौटती हैं तो दिशा बदलक्षितिज के विस्तार में बढ़ने लगती हैं और धरती से आकाश तकअपनी प्रत्यंचा खींच देती हैं
 
रश्मि प्रभा...
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अकेलापन क्यूँ?

अरसा............जाने कितना अरसा हुआकोई चिठ्ठी लेकर डाकिया नहीं आयालेटर बौक्स में पड़े रहे-बिजली बिल, मोबाइल बिलया कुछ प्रचार पत्र......जानती हूँ,सबकी अपनी दुनिया हैअपनी खुशियाँ, अपने दायरेअपने गिने-चुने सम्बन्ध-तो फिर ये अकेलापन क्यूँ?
 
रश्मि प्रभा...
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एक अलग पगडंडी

तराजू के पलड़े की तरह दो पगडंडियाँ हैं मेरे साथ एक पगडंडी मेरे जन्मजात संस्कारों की एक परिस्थितिजन्य ! मैंने तो दुआओं के दीपक जलाये थे प्यार के बीज डाले थे पर कुटिल , विषैली हवाओं ने निर्विकार,संवेदनाहीन पगडंडी के निर्माण के लिए विवश किया ...........
 
रश्मि प्रभा...