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'मुन्नू गुरु' अविस्मरणीय व्यक्तित्व
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10-May-2008 07:37 AM
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[अतुल की एक पोस्ट के जवाब में मैंने कानपुर के बारे में लेख लिखा था- झाड़े रहो कलट्टरगंज। उसे बाद में विस्तार देना हो नहीं पाया। इधर काफी दिन से हमें लग रहा था कि अपने शहर में बहुत कुछ है जो नेट पर
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ऎसी जगह ट्रांसफर करो, जहाँ जनता से सामना ना होता हो
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10-May-2008 07:23 AM
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इस ख़बर को पढ़ कर मुझे बरसों पुरानी एक सत्य घटना का स्मरण हो आया। घटना का विवरण तो मैं आख़िर मे बताऊंगा, अभी तो भ्रष्ट अधिकारियों की मलाईदार पदों पर तैनाती पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कड़ा रुख
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अदालत
में
लोकेश
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टिप्पणियां (कुल: 2)
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बुद्ध और मार्क्स साथ साथ - प्रेम कुमार मणि
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10-May-2008 07:05 AM
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मई महीने के पूरे चांद का दिन गौतम बुद्ध का जन्म दिन है और ५ मई कार्ल मार्क्स का। इसलिए इस बार जब लिखने बैठा तब इन दोनों का स्मरण स्वाभाविक था। इन दोनों के विचारों ने हमारी पीढ़ी और समय को प्रभावित
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कारवाँ
में
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मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?
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10-May-2008 06:28 AM
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अरे भाई बिरादर, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता है । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम
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हिंदी चिट्ठाजगत की सेवा...
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10-May-2008 06:14 AM
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कल रात सोने से पहले में दीपक भारतदीप जी के ब्लॉग दीपकबाबू कहिन की एक ताज़ा-तरीन पोस्ट पढ़ रहा था जिस में उन्होंने उड़न तश्तरी ब्लॉग के लेखक श्री समीर लाल जी के अभियान के बारे में लिखा है जिस के
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यदि धरती मे कही नरक है, तो यही है, यही है, यही है
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10-May-2008 06:02 AM
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रात के ढाई बज रहे है। छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर मे दमघोटू बदबू फैल रही है। शहर गहरी नीन्द से जाग उठा है। यह बदबू है डिस्टलरी की। रात का शैतान फिर से सक्रिय है। यह समझ नही आता कि यह देश आम लोगो का है
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पीपलवाला भूत (सत्य कथा)
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10-May-2008 05:44 AM
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बात उन दिनों की है जब हर गाँव, बाग-बगीचों में भूत-प्रेतों का साम्राज्य था। गाँवों के अगल-बगल में पेड़-पौधों, झाड़-झंखाड़ों, बागों (महुआनी, आमवारी, बँसवारी आदि) की बहुलता हुआ करती थी । एक गाँव से
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दुल्हन वही जो ....
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10-May-2008 05:43 AM
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यहाँ तक तो आगये, अब खीज हो रही होगी । फ़ोकस बहुत बनाये पड़े हैं, और घिसे पिटे शीर्षक देकर लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं । सीधी सी बात है,
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हिन्दी स्लैंग्स बताइये जी!
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10-May-2008 05:14 AM
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स्लैंग्स भाषा को समृद्ध करते हैं। शिवकुमार मिश्र का इनफॉर्मल ग्रुप जो स्लैंग्स जनरेट करता है, वह यदा-कदा मैं अपने ब्लॉग पर ठेल दिया करता हूं। उन्होंने एक शब्द बताया था -"खतम"। इसपर मैने एक पोस्ट
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किसी क्षण केवल जीकर देखो !
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10-May-2008 05:01 AM
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'जीवन का आदर्श क्या है?' एक युवक ने पूछा है।रात्रि घनी हो गयी है और आकाश तारों से भरा है। हवाओं में आज सर्दी है और शायद कोई कहता था कि कहीं ओले पड़े हैं। राह निर्जन है और वृक्षों के तले घना अंधेरा
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राकेट में खली
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10-May-2008 04:36 AM
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भाई साहब बुरा ना मानना, यकीन सा नहीं हो रहा है- जिस मुल्क में दस मिनट संसद कायदे से नहीं चलती, उस मुल्क में एक राकेट दस सैटलाइटों को लेकर चला गया आसमान में। टीवी चैनलों में इस पर ज्यादा कुछ
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दिल्ली की गर्मी में माँ के आँचल की शीतल छाया
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10-May-2008 03:57 AM
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दिल्ली से कल ही लौटे. टैक्सी घर के सामने रुकी तो छोटा बेटा विद्युत बाहर ही खड़ा था . सामान लेकर अन्दर पहुँचे तो घर साफ-सुथरा पाकर मन प्रसन्न हो गया. एकाध नुक्सान को नज़र अन्दाज़ करना ज़रूरी होता है सो
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संघ में सक्रिय थे सो बाल-विवाह कर लिया
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10-May-2008 03:35 AM
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संघ में बहुत सक्रिय थे तो मां-बाप ने सोचा कि शादी करा दो, सब ठीक हो जाएगा और तब हमारी शादी हो गयी। राजस्थान के एक विधायक ने राजस्थान में बाल-विवाह के मसले पर एनडीटीवी को ये बाइट दी है। जाहिर है
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गाहे-बगाहे
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विनीत कुमार
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पीपल की छाँव में कुछ पत्ते
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10-May-2008 03:30 AM
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******पीपल की छाँव में कुछ पत्ते ******पत्तेअक्सर टूट कर गिर जाते हैंया जला दिये जाते हैंजैसे दहेज लोभ में नारी॥पत्तेअक्सर पूजे जाते हैंकभी बेल के, कभी पीपल केजैसे चुनाव में जनता॥पत्तेअक्सर कुचले
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मिठास के कई रूप, खंड-कंद-कैंडी
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10-May-2008 02:52 AM
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शक्कर के देशी रूप को आमतौर पर खांड़ के रूप में जाना जाता है। बेहद प्रचलित यह शब्द संस्कृत के खण्डः से बना है जिसका एक अर्थ है टुकड़ा, पिण्ड, ईख-गन्ना अथवा कच्ची चीनी । खंड या खांड़ आज करीब करीब सभी
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खोज
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10-May-2008 02:40 AM
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एक खिड़की खोलीदूसरी खोलीदिखा कुछ औरदृश्य का नया कोणखोली तीसरीउसी दृश्य में दिखा नया धरातलव्योमखोली चौथीघुस आया जैसे विहंगम कमरे मेंइतना कुछ यहीं एक जगहपर इतने व्यस्त की देख नहीं पाताकिसी मुक्ति की
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कहां समझ आता है?..
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10-May-2008 02:38 AM
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हंसी-खेल में कहीं नस सरक जायेया पैर की उंगलियों के बीच जानेकहां से सरककर एक कंकड़चला आये, छूटा-दबा रह जायेऔर अचानक गड़े ऐसे कि मुंहसे कसकती एक कराह छूटेचटककर कहीं कुछ भीतर टूटेवैसे ही रहते-रहते
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azdak
में
Pramod Singh
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sarkar
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Ranjay Pal
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टिप्पणियां (कुल: 2)
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एक अपील
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10-May-2008 01:51 AM
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विस्फोट नाम ब्लागवाणी पर दिखा तो दो तरह की प्रतिक्रियाएं मिली हैं. क्या मैथिली जी डर गये? या फिर संजय तिवारी झुक गये. मैथिली जी किससे डरेंगे और क्यों? हां संजय तिवारी झुक गया है. लेट गया है, दंडवत हो
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Letter from Tenzin
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10-May-2008 01:45 AM
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I got an anguished response last night from a reader to an angry post I had written last month on the Tibetan issue. I would like to reproduce what she wrote: "Hi,I am one of what you call "India's
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बस, यूँही !!!!!
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10-May-2008 01:42 AM
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आज बहुत महीनों के बाद फुरसत मिली है , कुछ लिखने की \सोचने मे ही अक्सर वक्त बीत जाता था\ रोज मराह की जिंदगी से अब थोडी फुरसत है के कुछ अपनी पसंद का करे , मन चाहा वक्त बिताये \ गर्मियों की छुत्तिया तो
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अर्जुन सिंह का जहर बुझा तीर फिर फुस्स
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10-May-2008 01:10 AM
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घी हर किसी को हजम नहीं होता। पर कई होते हैं, जो इंसान को भी कच्चा चबा जाएं। डकार भी न लें। अपन आज राजनीति के दो महारथियों की बात करेंगे। पी. चिदंबरम। जिनने ताजा बढ़ी महंगाई पर कहा- ‘इतनी भी नहीं
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देश के 2 न्यूज़ चैनल : एक का तमाशा, दूसरे की अपील
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10-May-2008 01:05 AM
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अभी कल ही क़ी बात है। देश का सबसे उम्रदराज 24 घंटे का हिन्दी न्यूज़ चैनल करवट बदल रहा था। सभी की निगाहें टिकी हुईं थी- एक नई शुरुआत पर। तय समय था रात के 9 बजकर 56 मिनट। ठीक समय पर चैनल के "लोगो"
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'संत नहीं वेश्या बनना पसंद करूँगा'
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10-May-2008 12:46 AM
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क्रिकेटर वेश्याओं से अलग नहीं होते...महेश भट्ट की फ़िल्म जन्नत का ये डायलॉग कितने विवादों को जन्म देगा, ये तो नहीं पता। लेकिन इतना ज़रूर है कि इस संवाद से बिंदास महेश भट्ट को कोई चिंता नहीं. फ़िल्म
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दर्पण
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मंतोष कुमार सिंह
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जहां आती हो धूप जीने भर
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10-May-2008 12:14 AM
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कहाजाता है न कि हर लेखक की शुरुआत कविता से होती है। मेरा यह मानना है कि लिखने और पढ़ने की ओर आकर्षण बिना कविता के हो ही नहीं सकता। बचपन में हम सभी के कानों में अपनी मातृबोलियों और भाषाओं के गीत ही
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