कहां महफूज़ है एक स्टार ब्लॉगर...खुशदीप
कल मैनपुरी से ब्लॉगर भाई शिवम मिश्रा का फोन आया...उन्होंने बड़ी फ़िक्र जताई कि न तो ये स्टार ब्लॉगर महोदय फोन उठा रहे हैं, न ही इनका कोई अता-पता चल रहा है...मैंने भी कहा, भैया मुझसे आखिरी बार पांच छह दिन पहले जनाब ने बात की थी...आखिरी बार ये मिस्टर
Mar 21 2010 10:08 PM



किसी की ये अदा भी खूब रही कि अपने काव्य मंजूषा को गद्य मंजूषा बना दिया और उसमें भी अल्लाह को बड़ा और भगवान को छोटा कह दिया ।क्या वाक़ई भगवान छोटा और अल्लाह बड़ा है ?छोटाई और बड़ाई की तुलना के लिए दो वुजूद होना लाज़िमी है । इस सृष्टि के रचनाकार को अरबी भाषा
आये दिन सुनती रहती हूँ , मेरा धर्म बड़ा है , तुम्हारा छोटा, अल्लाह बड़ा है, भगवान् छोटा...और सोचती हूँ क्या ईश्वर को परिभाषित करना इतना आसन है ? क्या ईश्वर का विश्लेषण इतना सरल है ? क्या जो लोग ईश्वर या अल्लाह के बारे में इतनी बातें बताते हैं, सचमुच इसके
आज, 21 मार्च को ललित वाणी, ललितडॉटकॉम, चर्चा पान की दुकान पर, शिल्पकार के मुख से, चिट्ठाकार-चर्चा आदि वाले ललित शर्मा का जनमदिन है। इनका ईमेल पता shilpkarr@gmail.com है तथा मोबाईल नम्बर (0)9425514570 है।बधाई व शुभकामनाएँआने वाले जनमदिन आदि की जानकारी,
ब्लॉगिंग में जितने प्यार की मैं उम्मीद के साथ आया था, उससे दुगना क्या, कहीं ज़्यादा गुना मुझे मिला...देखते ही देखते ये मेरी 200वीं पोस्ट आपके सामने हैं....पिछले साल 125 लिखी थीं...इस साल की ये 75वीं पोस्ट है...छह दिसंबर को मेरी 100वीं पोस्ट की तरह मेरे
अक्सर आप सब की शिकायत रही है कि मैं इक ही मौजूअ (विषय) पर मुसलसल लिखती जा रही हूँ ..... 'मोहब्बत ' जहाँ प्यार करने वालों के लिए दुखदायी लफ्ज़ रहा ....वहीं शायर और अदबकारों का सबसे प्रिय विषय भी .....पेश है मोहब्बत से भरी इक जदीद सी नज़्म ......" आज दिल
...तो कल बात ख़त्म हुई थी एक चश्मे वाले अपशु पर । लेकिन मेरे विरोधियों में सभी ऐसे नहीं हैं । उनमें कुछ आदमी भी हैं और उनके अन्दर आदमियत भी है । वे विरोध तो करते हैं लेकिन खुद को इनसानियत से गिरने नहीं देते । इनमें से एक साहब ‘धान के देश में‘ रहते हैं ।
शहरों में,समाचार पत्रों में और ब्लागजगत में भी आज गौरैया चिंतन छाया रहा .घरों में फुदकने वाली गौरैया का आज दिन जो था .दिन-भर विश्वविद्यालय से लेकर शहर तक कि पर्यावरण विदों से मुलाकात हुई,इसी विषय पर बात हुई और अंततः कमोबेश बात इसी बात पर खत्म हुई कि
"ये क्या है मौली दीदी?"" आई-पॉड है.""ये क्या होता है?"" अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?"इतना सा मुंह निकल आया आदि का. क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है. "अरे
दिल तो होगा पर न होगी उसमें जान,सांसें तो होगी पर न होगा अरमान,ख़्वाब जो था पर अब न होगा आशियाँ,लिख दी है हमनें रुसवाई की दास्तान !
मेरा दिल करता हैतुम्हें अमलतास का पेड़ बना लूँकिसी गांव की अल्हड़ बाला सी तुमको पकड़कर घूमती जाऊँ घूमती जाऊँ जब तक तुम्हारी शाखाएंमुझे थाम न लें ...
नवरात्रि पंचम दिवस । 20.03.2010 अब तक आपने पढ़ा - फातिमा नावूत
प्रिय बहणों और भाईयों, भतिजो और भतीजियों सबको शनीवार सबेरे की घणी राम राम.ताऊ पहेली अंक 66 में मैं ताऊ रामपुरिया, सह आयोजक सु. अल्पना वर्मा के साथ आपका हार्दिक स्वागत करता हूं. जैसा कि आप जानते ही हैं कि अब से रामप्यारी का हिंट सिर्फ़ एक बार ही दिया जाता
यह न तो कोई पहेली है और न ही किसी तरह की प्रतियोगिता। इसके बावज़ूद मैं यह यह कहना चाहूँगा कि क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज किसका जनमदिन है? मुझे मालूम है कि शायद ही कोई बता पाए सही सही उत्तर! भले ही आप इसे कितना भी चाह्ते हों या इसकी चर्चा करते हों।
… बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया। … चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ
मातृभूमि की सेवा करने वाले सैनिक क्या अलग मिट्टी के बने होते हैं...क्या वो आपके-हमारी तरह इंसान नहीं होते...सरहद पर दुश्मन से मोर्चा लेते हुए शहीद होने वाले रणबांकुरों की रगों में क्या कुछ अलग तरह का लहू दौड़ता है...आज एक पिता की नज़र से बताता हूं आपको
माननीय डार्विन जी ने कभी फ़रमाया था कि मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे । उनसे आज तक साइन्टिस्ट्स साहिबान सहमत न हो सके तो भला हम ही क्यों होते ? लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है कि उनकी बात में पूरी सच्चाई तो चाहे न हो मगर वह पूरी तरह ग़लत भी नहीं है । वे एक पादरी थे ।
आज देश के एक वरिष्ठ पत्रकार से बात हुई... बात दुआ सलाम के बाद महिला आरक्षण और फिर शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद के शर्मनाक बयान पर आकर रुक गई... वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने हमारी प्रतिक्रिया जाननी चाही...हमने कहा- कौम के लिए इससे ज़्यादा डूब मरने की बात क्या
कल हमारी बेटी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी ..,जब हम वहाँ पहुंचे तो देखा कि अजब ही दृश्य था ...एक हॉल में कचहरी की तरह लगीं कुर्सी- मेज़ और खचाखच भरे लोग ..आप उसे सभ्य मच्छी बाजार कह सकते हैं .हर पेरेंट को एक -एक विषय के लिए सिर्फ पांच मिनट पहले से ही
मेरे जिस्म में ठहरी आत्मारोज मुझसे कहती है ..मुझे मैला मत करना !आज तुम्हारी हू,कल किसी और का होना है !तुम अपनी झूठी वाणी सेमुझे मत पुकारना !अपनी लालसा भरी आंखो सेमुझे मत देखना !मुझे उजळी रहने दोअपनी सच्चाई से ,अपनी विनम्रता से !मुझे शुद्धता देनाअपने
पता नहीं सोने को आदिकाल से लोगों ने अपने सर पर क्यूँ चढ़ा रखा है. कभी-कभी टेलिविज़न पर आने वाले एक विज्ञापन को देखकर मन में अक्सर यही ख्याल आता है. उसमें दिखाया गया है कि सोना पीढ़ियों को जोड़ता है. जबकि हकीकत यह है कि सोना पीढ़ियों से लोगों को तोड़ने का काम
ऐसे ही कुछ अटपटे शब्द ....मैंनादाननाजुककमजोरहताशमायूसतुम्हे लगती रहूमगरयाद रखकांधे मेरेतेरी बन्दूक के लिए नहीं है ....छोटे हाथ मेरेनाजुक अंगुलियाँभले होंगी मेरीभार उठाएंगीखुद इनकाजरुरत हुई तो ....जीतना मैं भी चाहूंतू भीबस जुदा हैरास्ता तेरा - मेराजीतना
सुखदा-----कहानी भाग --4 बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने
मेरी अपनी एक ज़िद हैरहने की, कहने की और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।यूँ तो दर्पण टूट ही जाता हैपर आकृति तो नहीं टूटती न !उसने मेज पर बैठी मक्खी कोमार डाला कलम की नोंक सेक्या मानूँ इसे ?विगत अतीत में दलित हिंसा की जीर्ण वासना काआकस्मिक विस्फोट
छ सौ रुपल्ली में साल भर लड़ने वाला भर्ती कर रखा है मैने। कम्प्यूटर खुलता है और यह चालू कर देता है युद्ध। इसके पॉप अप मैसेजेज देख लगता है पूरी दुनियां जान की दुश्मन है मेरे कम्प्यूटर की। हर पांच सात मिनट में एक सन्देश दायें-नीचे कोने में प्लुक्क से उभरता
छन छन्न छनमेरी पायल बोलती जाती और तुम मुदित हुए जाते होआँगन में अंगना बनी मैंडोल रही हूँपायल की झंकार रस घोल रही हैहक़ है मेरी पायलको बोलने का पर मुझे नहीं !!तुम क्यों मुझे बोलने दोगे पर होठ मेरे अब और प्रतीक्षा नहीं करेंगे
हां तो आप सबको रामप्यारे उर्फ़ "प्यारे" का सलाम नमस्ते! पिछले सप्ताह की ताजा खबर यह रही कि वार्षिक होली कवि सम्मेलन में ताऊ का भी कविता पाठ का नंबर आया. और ताऊ इसके लिये आशीर्वाद लेने माता रामप्यारी जी के आश्रम पहुंच गया.ताऊ ने कहा कि वो गजल पढना चाहता
बर्फ़ ही बर्फ़..... जेसा की एक बार दिनेशराय द्विवेदी, पं.डी.के.शर्मा"वत्स" अन्य कई ब्लांगर मित्रो ने कई टिपण्णियो मै कहा कि हम ने आज तक बर्फ़ गिरती हुयी नही देखी, तो मेने वादा किया था कि जब भी अगली बार बर्फ़ पडी तो मै विडियो फ़िल्म बना कर आप को गिरती
भारत भलमनसाहत दिखाते हुए जब भी पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, पाकिस्तान किसी न किसी बहाने कश्मीर को बीच में ले आता है...63 साल से यही कहानी चली आ रही है...दोनों देशों के बीच 176 बार बातचीत हो चुकी है...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...लेकिन
आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में
ज़्यादा टेंशन ठीक नहीं , आओ मूड चेंज करें।यहां ब्लॉग लिखा जा रहा है ,कोई महाभारत का युद्ध नहीं लड़ा जा रहा है ।कल हमारे प्रिय भाई आदरणीय श्री तारकेश्वर गिरी जी ने एक ऐतिहासिक ब्लॉग लिखा । ऐतिहासिक भी वह कई वजह से कहलाने का हक़दार है ।प्रमुख वजह तो यह बनी
जब भी उसने हक की बात की जमाने ने कहा ना री अंततोगत्वा नाम पड़ गया उसका नारी **** निगाहों में क्यों न उभरे निशान सवालिया देखते नहीं देकर ‘एक’ उन्होंने तो सवा लिया **** सुनते थे कि प्यार से लबरेज होकर मुस्कराती हैं हसीना लाख जतन किया पर वो तो हसी ना
एक नवयुवक है। इसी साल पढ़ाई खत्म होगी। कैम्पस साक्षात्कार में उसे बढ़िया नौकरी भी मिल गई है। कई जगह से रिश्ते आने शुरू हो गए हैं। अभी कुछ ही दिन पहले तक केवल एक विशेष कार, एक बड़ा टी वी, फ्रिज़, (बड़ा कठिन है इस सूची को बनाना! कुछ छूट गया तो? एक बेसिक सूची
1-मैं अबोलाएक भूला सा वेदमंत्र हूँ,खामियों से लथपथमैं लोकतंत्र हूँ.तंत्र हूँ, स्वतंत्र हूँ द्रष्टि में मगरओझल मैंआत्मा से परतंत्र हूँ.कहने को बढ़ रहा हूँ मैं.पर जड़ों में न झांकियेवहां से सड़ रहा हूँ मैं.लोक को धकेलतापरलोक की मैं राह में,कुछ मुसीबतों की
हम रोज ही कितना कुछ लिखते हैं। अपने लिखे को लेकर झगड़ा भी करते हैं। कभी कोई हमारे साहित्य की चोरी कर लेता है तो हम उसे धमकाते भी हैं। कभी कोई कागज उड़कर इधर-उधर हो जाता है तो कितना नाराज होते हैं अपने घर वालों पर? एक-एक शब्द को सहेज कर रखते हैं। अपनी
नोट: फिलहाल टिप्पणी सुविधा मौजूद है! मुझे किसी धर्म विशेष पर उंगली उठाने का शौक तो नहीं था, मगर क्या करे, इन्होने उकसा दिया और मजबूर कर दिया ! हमारे मुस्लिम समाज के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पिछले कुछ समय से इस हिन्दी जगत में न सिर्फ नफरत का आतंक फैला
प्रभो! आओ, आओ.....हम इस समय तुम्हे बडे दीन होकर पुकार रहे हैं। तुम तो दीनों की बहुत सुनते थे। सुनते क्या थे, तुम तो दीनों के लिए थे ही। क्या हमारी न सुनोगे! देखो जरा इस ब्लागजगत को एक नजर देखो तो सही। पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष नें यहाँ का सत्यानाश कर के रख
कहते हैं शब्दचित्र कलाकृति हैं, हृदय में उठते भावों के रंग से कलम की कूचि से कागज पर चित्रित. कवि, शब्दों को चुनता है, सजाता है, संवारता है और उन्हें एक अनुशासन देता है कि शब्द अपने वही मायने संप्रषित करें जिनकी उनसे अपेक्षा है. हर शब्द नपा तुला, रचना को
अब और इस दिल का क्या होगाइतना तन्हाँ है कितना तन्हाँ होगा सारे के सारे अक्स मुझे फ़रेब लगे कोई चेहरा तो कहीं सच्चा होगा मुझे सच का आईना दिखाने वाले शायद तेरी आँखों का धोखा होगादेखा कई बार मैंने पीछे मुड़ कर मेरे लिए भी कहीं कोई खड़ा होगा
Shuffle


























