मौज-दर-मौज

दर्पण मौज-दर-मौज इस वक्त की तल्खीयों का बोझ सबके शानों पर हैऐसे लम्हात में इम्तहाँ से  रोज रू-ब-रू होना पडता हैदरीचे दिल के जो, खोलोगे तो पाओगेछोटे-छोटे रोज़न नहीं इसमें बड़े-बड़े दर हैं यहाँ से तो दर्दों के काफ़िले गुज़र सकते हैं  इस मंज़र की... [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

नज़्म

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[18 Jun 2010 05:23 AM]

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